Podcast | Remembering The ‘People’s Poet, Rahat Indori
UrdunamaAugust 15, 202000:10:06

Podcast | Remembering The ‘People’s Poet, Rahat Indori

Sabhī kā khūn hai shāmil yahāñ ki mittī meiñ kisī ke bāp ka hindostān thodi hai This is an oft-quoted sher in political discussions and protests, especially those opposing the Citizenship Amendment Act and the National Register of Citizens. It also found its way into Parliament, when it was quoted by All India Trinamool Congress’ Mahua Moitra, while giving her maiden address. She listed seven signs in her power-packed fiery speech to make her point that the country is moving towards fascism. Celebrating the poet, who spoke of the social issues threatening the secular fabric of India, this special podcast is a tribute by The Quint. Tune In. Host, Writer and Sound Designer: Fabeha Syed Editor: Shelly Walia Music: Big Bang Fuzz Learn more about your ad choices. Visit megaphone.fm/adchoices
Sabhī kā khūn hai shāmil yahāñ ki mittī meiñ
kisī ke bāp ka hindostān thodi hai

This is an oft-quoted sher in political discussions and protests, especially those opposing the Citizenship Amendment Act and the National Register of Citizens. It also found its way into Parliament, when it was quoted by All India Trinamool Congress’ Mahua Moitra, while giving her maiden address.

She listed seven signs in her power-packed fiery speech to make her point that the country is moving towards fascism.
Celebrating the poet, who spoke of the social issues threatening the secular fabric of India, this special podcast is a tribute by The Quint. Tune In.
Host, Writer and Sound Designer: Fabeha Syed
Editor: Shelly Walia
Music: Big Bang Fuzz

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00:00:02 Speaker 1: लिस्टिंग क्विंट 00:00:08 Speaker 1: हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं। 00:00:15 Speaker 1: हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं। हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं। मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं। 00:00:32 Speaker 1: हम अपनी जान के दुश्मन हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं। हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं। मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं। इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं सब जो ये दीवार का सुराख है, साजिश का हिस्सा है। 00:00:59 Speaker 1: मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं जो ये दीवार का सुराग है, साजिश का हिस्सा है। मगर हम इसको अपने घर का रोशनदान कहते हैं। 00:01:19 Speaker 2: जिस बुनियादी बात पर बाबा साहब अंबेडकर ने मुल्क का आइन यानी संविधान लिखा उसे राहत इंदौरी ने एक ही शेर में लिख दिया राहत इंदौरी एक ऐसा शायद जिसकी रगो में हिंदुस्तान रहता है, जो बार बार अपनी शायरी से एक ही बात अलग अलग ढंग से कहता है कि मैं जब मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना, लहू से मेरी पेशानी हिंदुस्तान लिख देना और आज इसे हिंदुस्तानी को याद करेंगे, उसी की बात करेंगे। 00:01:53 Speaker 2: क्विंटर क्वीन हिंदी पर आप सुन रहे हैं उर्दू नाम आ मैं हूँ और ये ऍम कर रहे हैं उर्दू के शायर राहत इंदौरी को। जिनका कोविद इनफेक्शन की वजह से ग्यारह अगस्त को सत्तर साल की उम्र में इंदौर के एक हॉस्पिटल में इंतकाल हो गया। 00:02:07 Speaker 2: आज की तारीख में हिंदुस्तान के सबसे मशहूर शायरों में उनका शुमार होता है जिन्हें उर्दू मुशायरों की रुक कहा जाता है और जो अपनी बेबाक शायरी से आपस में बांटने वाले पॉलिटिशन की आँखों में आँखें डाल के ये कहने का जिगरा रखते थे कि किसी के बाप का हिंदुस्तान थोडी है 00:02:25 Speaker 2: अगर खिलाफ है होने दो जन थोडी है ये सब धुआँ है कोई आसमान थोडी है लगेगी आग तो आएँगे घर कई जद में लगेगी आग तो आएँगे घर कई जद में यहाँ पे सिर्फ हमारा मकान थोडी है मैं जानता हूँ कि दुश्मन भी कम नहीं लेकिन मैं जानता हूँ कि दुश्मन भी कम नहीं लेकिन हमारी तरह हथेली पे जान थोडी है 00:02:52 Speaker 2: हमारे मुँह से जो निकले वही सदाकत है हमारे मुँह से जो निकले वही सदाकत है हमारे मुँह में तुम्हारी जुबान थोडी है जो आज साहिबे मसनद है कल नहीं होंगे जो आज साहिबे मसनद है कल नहीं होंगे किराएदार है जाती मकान थोडी है 00:03:12 Speaker 2: सभी का खून है शामिल यहाँ की मिट्टी में जो भूल गया है कि हिंदुस्तान का मतलब क्या है उसे ये शेर सुनाया जाए और बार बार सुनाया जाए सभी का खून है शामिल यहाँ की मिट्टी में किसी के बाप का हिंदुस्तान थोडी है 00:03:34 Speaker 2: राहत इंदौरी साहब ने यही नजम कई मुशायरों में पडी और जिस तरह से पढी जो समां बांध के पडी वो कोई नहीं कर सकता मैंने भी ये जो पढा है इस वक्त सिर्फ एक स्पाॅट की रस्म अदा की है कि राहत साहब की बात हम इस शेर के इस नजम के पढे बिना नहीं कर सकते। 00:03:51 Speaker 2: राहत इंदौरी की पैदाइश थी पहली जनवरी उन्नीस सौ पचास की और जब वो पैदा हुए तो उनका नाम राहत कुरैशी रखा गया। बी ऍम उर्दू में क्या और पीएचडी के लिए जो मौजूद चुना वो भी उर्दू जबान से जुडा था उनकी तीस इसका टाइटल था उर्दू जबान में मुशायरा और वैसे ही वो खुद भी चालीस पैंतालीस सालों से करीब भारत में जो मुशायरे हो रहे थे उनमें आगे से आगे रहे 00:04:14 Speaker 2: और कुमार विश्वास जो उनके करीबी थे, उन्होंने तो अपने दोस्त इंदौरी साहब के बारे में कुछ ऐसा कहा है कि राहत इंदौरी साहब तीन फील्ड में माहिर है। पहला बतौर ऍम इक दूसरा ऐसा शायर जिसकी लाइफ परफॉर्मेंस इसकी काफी चर्चा होती रहती है। कोई पसंद करता है, कोई पसंद नहीं करता और तीसरी फील्ड है बतौर शायरे आजम जो इंटरनॅशनल ही पसंद किए जाते हैं। जिनकी शायद आई आपको हिंदुस्तान के बाहर भी मिल जाएंगे। 00:04:45 Speaker 2: राहत इंदौरी की शायरी में अगर हिजबुल वतनी दिखेगी अगर एक ऐसा जज्बा दिखेगा जो बार बार अपने हिंदुस्तान, अपने मुल्क, अपनी मिट्टी की तरफ झुका चला जाता है तो दूसरी तरफ उनकी शायरी में एक ऐसा जज्बा दिखेगा जो टूटे हुए दिल को एकदम से जोड के रख दे जो हौसला बडा है और पस्त हिम्मत को दोबारा से ठीक करते मसलन ये 00:05:10 Speaker 2: आँख में पानी रखो, होटों पे चिंगारी रखो जिन्दा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो 00:05:21 Speaker 2: तूफानों से आँख मिलाओ सैलाबों पार वार करो मल्लाहों का चक्कर छोडो तैर के दरिया पार करो 00:05:32 Speaker 2: अंदर का जहर चूम लिया धुल के आ गए कितने शरीफ लोग थे सब खुल के आ गए 00:05:42 Speaker 2: ना हम न किसी हम नशीं से निकलेगा हमारे पाव का कांटा हमी से निकलेगा मेरी ख्वाहिश है के आंगन में ना दीवार उठे मेरे भाई मेरे हिस्से की जमीन दूर रख ले। 00:05:58 Speaker 2: फिर आते आते ऐसा लगता है कि जरूर उन्हीं चीजों के बारे में बात हो रही है जिनको हम अखबारों में और टीवी चैनल पर आए दिन पढते रहते हैं। राहत इंदौरी की शायरी के बारे में ये नहीं कहा जा सकता कि ये सिर्फ और सिर्फ शायरी है। ये एक बहुत ही स्ट्रॉंग पाॅलिटिकल काॅफी है। 00:06:14 Speaker 2: जावेद अख्तर ने राहत इंदौरी के लिए एक बार कहा था कि वो हिंदुस्तान के लिए वो है जो हबीब जालिब पाकिस्तान के लिए रहे। पाकिस्तान में जब जॅनरल अयूब खान ने अपने ही बनाए नए आ इनके तहत पाकिस्तान में मार्शल लॉ गलत किया था। तब उसके रिस्पॉन्स में जालिब की लिखी नौं दस्तूर बहुत मशहूर हुई थी। 00:06:32 Speaker 2: उसकी आइकॉनिक लाइन मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता। आज भी प्रोटेस्ट का एक मशहूर नारा बनके गूंजती रहती है। मुँह को पीपल स्पॉट कहते हैं और इंडिया में राहत इंदौरी का भी वही काम समझा जाता है। 00:06:46 Speaker 1: मैं जब मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना। मैं जब मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख 00:06:57 Speaker 1: कितना लहू से मेरी पेशानी हिंदुस्तान लिखते हैं 00:07:05 Speaker 1: जिंदाबाद 00:07:12 Speaker 2: राहत साहब उर्दू समझने वाली क्लाॅज ही नहीं बल्कि मानसिक तक के दिलों को अपनी शायरी से जोड के रखते थे। खासकर आइडेंटिटी पॉलिटिक्स पर बेशुमार आशा और उनके यहाँ मिलते हैं। मसलन अपनी पहचान मिटाने को कहा जाता है, बस्तियां छोड के जाने को कहा जाता है। 00:07:35 Speaker 2: आपने आता है जो गरीबों से पसीने की कमाई मांगे। 00:07:46 Speaker 2: सारा दिन जेल की दीवार उठाते रहिए। ऐसी आजादी के हर शख्स रिहाई हाँ, 00:08:00 Speaker 2: शायर का काम होता है कि अपने आसपास के समाज को अपने अंदर जस्ट करले और फिर दिल की गहराइयों से जो निकले उसे सियाही में डुबोकर का दे दे। राहत इंदौरी हमारे बीच नहीं रहे लेकिन जब जब भारत का संविधान कंस्टीट्यूशन से कोई भी खेलेगा तब तब राहत इंदौरी के आशार आइना दिखाएंगे 00:08:26 Speaker 1: लगेगी आप तो आएँगे घर के सदमे यहाँ पे हमारा मकान थोडी है 00:08:39 Speaker 1: हाँ 00:08:43 Speaker 1: जो आज शहीद मसला है जो आज शहीद हैं कल नहीं होंगे तो आज शहीद मसलते कल नहीं होंगे किरायेदार है साथ ही मकान 00:08:57 Speaker 1: ये सभी का खून है शामिल 00:09:01 Speaker 1: यहाँ की 00:09:05 Speaker 1: किसी के बाप का हिंदुस्तान थोडी है