भगवान परशुराम के शिष्य – भीष्म पितामह
शांतनु को छोड़कर जाने के बाद देवी गंगा ने देवव्रत को एक राजा में होने वाले सभी गुणों की शिक्षा दी। युद्धकला में निपुणता पाने के लिए उन्होंने अपने पुत्र को भगवान परशुराम के पास शिक्षा लेने के लिए भेजा।
भगवान परशुराम ने देवव्रत को सभी दैवी अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा दी और देवव्रत भी एक उत्तम शिष्य की भांति युद्धकला में दक्ष हो गए।
जब भीष्म ने राजकुमारी अम्बा से विवाह करने से मना कर दिया तो वो भगवान परशुराम के पास गयीं और उनसे अनुरोध किया की वो भीष्म को उनकी प्रतिज्ञा तोड़कर विवाह के लिए मना लें।
भीष्म ने भगवान परशुराम की बात नहीं मानी और दोनों युद्धाओं के बीच कुरुक्षेत्र के मैदान में एक भीषण युद्ध छिड़ गया। इक्कीस दिनों तक युद्ध के बाद अंत में भीष्म ने वसुओं का प्रसवापास्त्र अपने गुरु पर चलाने की सोची, जिसका तोड़ भगवान परशुराम के पास नहीं था।
अंत में देवर्षि नारद और परशुराम जी के दादा रिचीक मुनि ने दोनों योद्धाओं को यह युद्ध रोकने को कहा और अम्बा भीष्म से बदला लेने की लिए शिवजी की तपस्या करने चली गयी।
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