बॉयज लॉकर रूम- समाज की मानसिकता दिखाने वाला खतरनाक वायरस
Big Story HindiMay 06, 202000:11:27

बॉयज लॉकर रूम- समाज की मानसिकता दिखाने वाला खतरनाक वायरस

दिल्ली के टॉप स्कूलों में पढ़ने वाले कई लड़के एक इंस्टाग्राम ग्रुप से जुड़े थे, जिसका नाम ‘बॉयज लॉकर रूम’रखा गया था. इस ग्रुप के कुछ स्क्रीनशॉट्स सोशल मीडिया पर आते ही तहलका मच गया. उनमें ये 17-18 साल के लड़के अपनी ही क्लास या स्कूल की लड़कियों के बारे में भद्दी और अश्लील बातें करते दिख रहे हैं. ग्रुप में नाबालिग लड़कियों की अश्लील तस्वीरें भी पोस्ट होती थीं, उन्हें मॉर्फ और ऑब्जेक्टिफाई किया जाता था. सिर्फ इतना ही नहीं, इन लड़कियों के साथ गैंगरेप करने की बात भी इस ग्रुप में चल रही थी. यही वो मानसिकता है जो किसी भी समाज के लिए खून चूसने वाला एक पैरासाइट है. कोरोना वायरस जैसी महामारी से निजात पाने के लिए तो वैक्सीन बनाई जा रही हैं, लेकिन इस खतरनाक बीमारी का भी इलाज अगर नहीं खोजा गया तो ये समाज को जरूर निगल जाएगी. आज इस पॉडकास्ट में 'बॉयज लॉकर रूम’ से ही जुड़े मुद्दों पर एक्सपर्ट्स से बात करेंगे. और जानेंगे कि कैसे इस तरह के सोशल मीडिया चैट ग्रुप्स रेप कल्चर को बढ़ावा देते हैं? और क्या स्कूल कॉलेज इस तरह की मानसिकता का एपिसेंटर होते जा रहे हैं? Learn more about your ad choices. Visit megaphone.fm/adchoices
दिल्ली के टॉप स्कूलों में पढ़ने वाले कई लड़के एक इंस्टाग्राम ग्रुप से जुड़े थे, जिसका नाम ‘बॉयज लॉकर रूम’रखा गया था. इस ग्रुप के कुछ स्क्रीनशॉट्स सोशल मीडिया पर आते ही तहलका मच गया. उनमें ये 17-18 साल के लड़के अपनी ही क्लास या स्कूल की लड़कियों के बारे में भद्दी और अश्लील बातें करते दिख रहे हैं. ग्रुप में नाबालिग लड़कियों की अश्लील तस्वीरें भी पोस्ट होती थीं, उन्हें मॉर्फ और ऑब्जेक्टिफाई किया जाता था. सिर्फ इतना ही नहीं, इन लड़कियों के साथ गैंगरेप करने की बात भी इस ग्रुप में चल रही थी.
यही वो मानसिकता है जो किसी भी समाज के लिए खून चूसने वाला एक पैरासाइट है. कोरोना वायरस जैसी महामारी से निजात पाने के लिए तो वैक्सीन बनाई जा रही हैं, लेकिन इस खतरनाक बीमारी का भी इलाज अगर नहीं खोजा गया तो ये समाज को जरूर निगल जाएगी. 

आज इस पॉडकास्ट में 'बॉयज लॉकर रूम’ से ही जुड़े मुद्दों पर एक्सपर्ट्स से बात करेंगे. और जानेंगे कि कैसे इस तरह के सोशल मीडिया चैट ग्रुप्स रेप कल्चर को बढ़ावा देते हैं? और क्या स्कूल कॉलेज इस तरह की मानसिकता का एपिसेंटर होते जा रहे हैं?

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