What does it mean to exist? Is wujood simply about being or does it also include the presence, influence and meaning that come with being?
In this episode of Urdunama, Fabeha Syed explores wujood (وجود) through poetry, unpacking the many ways poets have thought about existence. Sometines as presence, as rootedness, as freedom, and as the forces that shape the way we inhabit the world.
From Iqbal’s striking conversation between a tree and a desert bird to his idea of rising beyond the jazb-e-khaak, or the pull of the wordly desires, the episode looks at what it means to be here and what makes that presence matter.
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[00:00:36] Monsoon, dhiray-dhiray ruchstet ho gaya hai. और अच्छी चीज़ अगर कोई हुई है, तो वो ये है कि अनाज में सूरसूरी लगने का जो डर है, वो थोड़ा कम हो गया है. देखे, सारी खुबसूरती monsoon की एक तरफ है, लेकिन एक inconvenience जो humid weather की कहीं भी होती है, वो अपनी जगा है. पूरे monsoon हम एक छोटी सी सूरसूरी जो grain weevil होता है, उससे बचने के लिए कितनी तरकीवे करते हैं.
[00:01:04] चावलों में सरसो का तेल मल रहे हैं, दालों में साबुत लाल मिर्च, हल्दी कट्टू कड़ा तेस, पता पता नहीं क्या क्या रखके स्टोर कर रहे हैं, grains अपने. But thankfully October has started और वैसे तो Bombay की heat अपनी चरम सीमा पर October के महीने में ही होती है. तो जो कुछ सुखाना है, अब आप सुखा लीजिये. कोई आटे, पाटे बनाने हैं आपको, तो अपने जो, जवा, रागी, भीगो के आराम से आप सुखा सकते हैं और फिर आटा बना सकते हैं.
[00:01:31] तो कहने का मतलब यह है कि जो एक सुरसुरी है, उसका वुजूद कितना सा, इतना सा, बिल्कु चोटा सा. लेकिन उसका पसर देखे, पूरे घर को अपने हिसाब से न चा सकती है. तो इस हफते, मैंने सोचा, let's talk about सुरसुरी. I mean, let's talk about वुजूद, जिसका मतलब होता है existence. लेकिन existence का होना अपने आप में क्या वुजूद का concept पूरा explain कर लेता है?
[00:01:55] या फिर वुजूद की जो condition है तभी satisfy होती है, जब उस existence का कोई असर होता है? इन ही सवालों पर आज हम बात करेंगे. The Queen पर शुरू हो गया है उर्दू नामा, मेरा नाम है पबेह सायद. और मैंने सोचा कि हम खुदी के ऊपर कितने अशार पढ़ चुके हैं, कितनी बाते हमने की हैं, खुदी यानी selfhood.
[00:02:21] तो एक काम ये करते हैं कि पूरे महीने ही, अलग-अलग stand-alone episodes में नहीं, बलके इस पूरे महीने में, why not खुदी को थोड़ा-थोड़ा, you know, अलग-अलग lenses से देखने की कोशिश करें?
[00:02:33] क्या है वो चीज जो हमें shape करती है, जो हमें define करती है, जो हमें ground करती है, और आखर में हमें हम बनाती है, तो ये पूरे महीने, खुदी का जो concept है, उसे समझेंगे, different पहलूँ को explore करते हुए, और आज हम शुरू करेंगे, बिलकुल शुरूआच से, वजूद से, और पहला share
[00:02:55] ही है, अलामा इकबाल का, जिन्होंने खुदी and selfhood का जो concept है, वो हमें सोचना सिखाया है, कि इस पर हम कैसे सोचें, कैसे इसको समझें, तो अलामा इकबाल के नजम है, परवाज, वो आपको पढ़कर सुनाऊंगी, तो ये नजम तो आपको पढ़कर सुनाऊंगी ही, लेकि
[00:03:19] उससे पहले थोड़ा सा समझाना चाहती हूं उसके बारे में, इस नजम में, शायर हमको वजूद के बारे में बताना चाहरे हैं, through its limitations and true freedom का मतलब क्या है, वो बताने की कोशिश की है, और ये सब समझा रहे हैं, through a conversation between a tree and a desert bird, एक दरखत और एगिस्तान के एक परिंदे के ब
[00:03:49] रखत ने एक रोज मुरग सहरा से, सितम पे गम कदाय रंग और बू की है बुनियाद, ख़दा मुझे भी अगर बालो पर अता करता, शगुफता और भी होती ये आलम एईजाद, दिया जवाब उसे खूब मुरग सहरा ने, गजब है दाद को समझा हुआ है तू बेदाद
[00:04:09] जहां में लज़त परवाज हक नहीं उसका, वजूद जिसका नहीं जजब खाक से आजाद, वाह वाह वाह वाह वाह वाह, भाह, मैं सच में फिर से काऊंगे, अलम एख़वाल के जो नजबे हैं, जोनके अशार हैं, किसी ठेरपी से कम नहीं हैं, बहुत गोर से सुनिएगा तोड़ तोड़ के मैं आपको समझाती हूँ कहा दरخت ने एक रोज मुर्गे सहरा से
[00:04:39] दरخت यानि ट्री जमीन में गड़ा हुआ अपनी रूटस से बंधा हुआ वो डेजर्ट बर्ड यानि मुर्गे सहरा से कहता है कि दुनिया गम कदाए रंग अबू ये रंग अबू की जो दुनिया है जो दुखों और गैद का घर है जल्म और रिस्ट्रिक्शन्स पर बनी है तो दरخت कमानना है कि अगर खुदा उसे भी बालो पर यानि विंग्स दे देता तो इस क्रियेशन का रंग और खुबसूरती कुछ होरी होती
[00:05:08] खुदा मुझे भी अगर बालो पर अता करता शगुफता और भी होता ये आलम एज़ाद तो यहां दरخت के लिए परवाज यानि फ्लाइट फ्रीडम और मुकमल होने का सिंबल है वो इन सारी चीजों के बारे में डिजायर करता है वो समझता है कि अगर मैं मूव कर सकता तो मैं आजाद होता मैं क्योंकि अपनी रूटस से जुडा हुआ हूँ एक ही चगा पे खड़ा हुआ हूँ तो मैं कैद में हूँ फिर परिंदा जवाब देता है
[00:05:38] दिया जवाब उस खूब मुर्ग सहरा ने घजब है दाद को समझा हुआ है तू बेदाद यहां पर पारडॉक्स अफ फ्रीडम समझने की कोशिश कीजिया मुर्ग सहरा दरख्त की इस सोच को पलट देता है दरख्त शिकायत करता है ना भाई मैं एक जगाँ खड़ा हुआ हूँ अगर मुझे भी पर्देता खुदा तो क्या ही बात होती तो मैं सच में सही माइनों में आज़ाद होता तो मुर्ग सहरा फिर पलट के जवाब देता है दरख्त को
[00:06:06] वो कहता है ये कितनी अजीब बात है कि तू दाद यानि खुदा की तरफ से दी गई नियामत को बेदाद यानि इंजस्टिस जल्म समझ रहा है अजल लब ये है कि जिस चीज़ को दरख्त अपनी मजबूरी और गुदरत के नाइंसाफ ही समझ रहा है असल में वही उसके वजूद का मकसद है उसके वजूद का मकसद ही जमीन पे खड़े रहना है साया देना है जमीन को
[00:06:32] अब आते है लास्ट में इस नाजम की जो बिलकुल कोर फिलासोफी है वो ये है कि जहां में लज़द परवाज हक नहीं उसका ये अभी डायलॉग मुरग सहराही की तरफ से हो रहा है वो ही बात कर रहा है पहले तो तुम ये सुनो कि जो नियमत है खुदा की उसको तुम इंजस्ट समझ रहे हो और तुमें लगता है ये तुमारी गयद है तो अब सुनो असल अज़ादी क्या है
[00:06:57] जहां में लज़त परवाज हक नहीं उसका वजूद जिसका नहीं जजब खाक से आज़ाद ये है बहुत ही पावरफुल हिस्सा इस नज़म का शायर कहता है कि इस दुनिया में लज़त परवाज फलाइट का जो मज़ा है ट्रांसेंडिन्स का जो एहसास है हर किसी का हक नहीं है परवाज सिर्फ उनका हक है जिनका वजूद जजब खाक से आज़ाद हो
[00:07:24] यहां जजब खाक का मतलब है मिट्टी की कशिश या आप यू कहें कि वर्ल्ली डिजायर्स की जो ग्रीड है और जो कॉंस्ट्रेंट्स है उनकी बात हो रही है उन्हें कहा गया है जजब खाक तो परिंदा चाहे जमीन पर बैठा हो लेकिन जब वो उड़ता है तो उसका वजूद जमीन के बोज और अटाच्मेंट से आजाद हो जाता है दरख्त सिर्फ इसलिए उड़ना चाहता है क्योंकि वो अपनी जगा से फ्रस्ट्रेड़ेड है अपनी करिंट सिचुएशन से बोर हो चुगा है
[00:07:53] लेकिन अगर उसके खुदी या रूट्स ही जमीन में पूरी तरहां जुकी हुई है तो विंग्स मिलने से भी वो वाकियाजाद नहीं होगा तो इसका मतलब यह है कि जो असल फ्रीडम है या वजूद की बुलंदी सिर्फ फिजिकल मॉव्मेंट या विंग्स पर आने से नहीं होती है उडान भरने से नहीं होती है यह इस बात पर डिपेंड करती है कि आपका वजूद मटिरियल अटाश्मेंट्स और वर्ल्डली डिजायर्स के जो
[00:08:21] दुनियावी डिजायर्स का जो पुल है उस से कितना उपर उठ चुका है जहां में लज़त परवाज हक नहीं उसका वजूद जिसका नहीं जजब खाक से आजाद यानि आउटकम्स की आप परवाह मत कीजिए करम करते चलिए अब अल्लामा अकबाल का ही एक और शेर है बहुत ही मशूर तरीन
[00:08:59] spiritual नजरिये से देखा है और समझाए लिखते हैं है राम के वजूद पे हिंदोस्ता कोनाज है राम के वजूद पे हिंदोस्ता कोनाज एहले नजर समझते हैं उसको इमाम हिंद है राम के वजूद पे हिंदोस्ता कोनाज यहां शायर कहता है
[00:09:27] कि हिंदोस्ता को श्री राम के वजूद पर फखर है यहां वजूद सिर्फ एक हिस्टॉरिकल फिगर या बादशाहत उनकी उससे मुराद नहीं है बलकि एक ऐसे शखसियत का यहां पर जिक्र हो रहा है जिसके होने से पूरे देश की पहचान, उसकी मिट्टी, उसका कल्चर सब पर रौनक है सब पर एक तरह का ग्लो है राम का जो वजूद है हिंदोस्तान के लिए एक अजीम सरमाया है बहुत ही प्रेशिस ट्रेजर है
[00:09:55] एहले नजर समझते हैं उसको इमाम हिन एहले नजर कौन है एहले नजर उन लोगों को कहा जाता है जो बारीक बीन हों, समझदार हों, हक्यकत पसंद हों तो ऐसे समझदार लोगों के बारे में शायर लिखता है कि ऐसे समझदार लोग राम को सिर्फ एक मजभी या पुराने वक्त के राजा नहीं मानते हैं, बलकि उन्हें राम को इमाम हिंद समझते हैं, हिंदुस्तान का लीडर, हिंदुस्तान का गाईड या पेशवार.
[00:10:24] तो यहां इमाम का मतलब एक ऐसा शक्स है, जिसका किरदार और इनसानी औसाफ, यानि उसके वर्चूज एक ऐसा मकाम रखते हैं, जिनने देखकर पूरे समाज को एक रास्ता मिलता है, गाईडिंस मिलती है.
[00:10:37] तो इकबाल का जो शेर है, उसके जरीए वो यह कह रहे हैं, कि मजभब या फिरके की सरहदों से उपर उठकर, जो लोग दिल की आँख से और गहराई से देखते हैं, वो समझते हैं, कि श्री राम का जो वजूद है, इस मुल्क की मौरल और स्पिरिचुल रूँ की बुनिय
[00:11:08] यह जो शेर है, एक ऐसे टॉक्सिक या ओवर पारिंग रिलेशन्शिप की कहानी है, जहां एक इनसान ने दूसरे के वजूद पर पूरा कब्जा कर लिया है, अब जब वहां दर्द और घुटन बढ़ चुकी है, जो शायरा हैं, परवीन शाकिर हैं, वो अपने इस जाद�
[00:11:35] की मांग कर रही हैं, जिसने पूरी तरहां से उनकी जो मेंटल और एमोशनल सलाहियते हैं उनके पर पबजा कर रखा है, तो लिखती हैं कि उसकी मुठी में बहुत रोज रहा मेरा वुजूद, मेरे साहिर से कहो अब मुझे आजाद करे, यहां मुठी में होना एक मेटफर ह
[00:12:05] यहां पर परवीन शाकिर कहती हैं कि मेरा वजूद, मेरी पहचान, मेरी खुदी, मेरी जिन्दगी एक लंबे अरसे तक उस शख्स की मुठी में गैद रहा, यानि उसने मुझे इस तरहां चकर रखा था, कि मेरा अपना कोई अलग वजूद या मुधार होना बाकी नहीं र
[00:12:38] परवीन शाकिर उस शख्स को साहर कह रही हैं क्योंकि उसके इश्क, उसके कैरिज्मा या उसके मैनिफिलिटिव चाम ने ऐसा जादू किया है उन पर, जिसकी वज़े से वो मजबूर हैं, वो उन बेडियों को तोड़के बाहर आने की हिम्मत ही नहीं कर पा रही हैं, तो इ
[00:13:12] अब जरा जॉन इलिया का आप ये शेर सुनिये, जिसमें एक्जिस्टेंशल शेर है ये भी, इसमें उन्होंने इंसान के वुजूद और उसके जो खोकलेपन है, खोकलेपन की जो वल्नरुरुबिलिटी है, उसकी बात की है, तो लिखते हैं, एक चा के बाराहनगी है वु�
[00:13:34] जूद और चाके बाराहनगी, चाक का मतलब होता है फटा हुआ हिस्सा या टॉर्न अपार्ट, बाराहनगी का मतलब है नंगपन, something that is exposed, naked, तो जॉन इलिया कहते हैं कि हमारा जो वुजूद है, एक्जिस्टेंस है, असल में कोई मुकमल या खुबसूरा चीज नहीं है, बल
[00:14:04] हुआ है, अगला मिस्रा है, पैरहन होतो बे रफू ठहरे, यहाँ पे illusion है, जो covering का हमारी, के हम ढग लेंगे तो सब छुप जाएगा, उसकी बात कर रहे हैं, पैरहन का मतलब होता है, लिबास, कपड़ा, रफू का मतलब होता है, फटे हुए कपड़े पर किये जाने वाले �
[00:14:23] जब आप मेंड कर देते हैं, उसे रफू कहते हैं, तो नॉमली जब कोई कपड़ा फट जाता है, तो हम उस पर रफू करवाते हैं, ताकि वो ठीक लगने लगे, ऐसा ना लगे, कि भईये, यहाँ पे स्कार पड़ा हुआ था, यहाँ से कपड़ा फटा हुआ था, ऐसा ना
[00:14:52] जबनिया के यह लिबास इतने बेमानी हैं, कि इन पर रफू का भी कोई फाइदा नहीं, क्योंकि असल हकीकत तो बरहनगी है, नेकड टूथ है, असान जबान में अगर समझें, तो जॉनीलिया यह कह रहे हैं, कि इनसान का वजूद अंदर से एकदम एक्सपोजड है, वल्
[00:15:21] जुद है, जिसे हम छुपा नहीं सकते, जिसको फानी होना ही होना है, तो किसी भी तरह के आरोगन, किसी भी तरह के खुशफेहमिया रखने का कोई मतलब नहीं है, वो सिर्फ उपरी परत है, अंदर से सब को पता है, सब कैसे हैं.
[00:15:38] अब आखिर में आ गए हैं, पॉड्कास्ट के, और आपको जाते जाते, चगबस्त ब्रज नरायन का एक नहायत खुबसूरा तब फिलोसॉफिकल शेर सुनाएंगे, इसमें काइनात और वजूद के एक गहरे रास को घुन्चे के हवाले से समझाया गया है, गुलाप के हव
[00:16:07] जे है सब है, वो अदम मेरा, इस शेर का मरकजी नुक्ता क्या है, वो ये है कि दुनिया ये समझती है कि जब गुन्चा खिलता है, तो एक मुकमल गुल का वजूद सामने आता है, यानि एक नई हस्ती पैदा होती है, लेकिन गुन्चा हस कर ये कह रहा है कि जिसे तुम सब
[00:16:24] तो एक फूल का वजूद मान रहे है, वो असल में वो मेरा अदम है, मेरी नॉन एग्जिस्टेंस है, मेरी खतम होने का नाम है, गुन्चे का खिलना, जब तक कली था, उसका अपना एक अलग वजूद और रास था, लेकिन जैसे ही वो फूल बनी, उसका असली रूप और अ
[00:16:43] तो शकल है, वो खतम हो गए, वो खिलकर बिक्र गई है, जिन्हें दुनिया कामियाबी, जाहिर होने या मुकमल होने को जशन समझती है, असल में वो ही उस चीज़ की मौत या फना होने की शुरौात होती है, और ये भी तैय है, कि जब कोई चीज फना हो जाती है, तो उसके
[00:17:05] पर शायद वुजूद का जो सवाल है वो सिर्फ इतना नहीं है कि हम हैं पर सवाल ये है कि हाओ वी आर वेर वी आर और किस चीज के साथ हम बंधे हुए हैं। इकबाल के दरखत और मुर्ग सहरा की तरह हम सब अपने अपने तरीके से दुनिया में मौजूद हैं। किसी का वजूद जमीन से जुड़ा है किसी का परवास की तरफ और शायद इसी फर्क में अगला सवाल छुपा है कि हमारी फितरत क्या है। इसलिए अगले हफ़ते का लफज है मिजाज पहले से बता रही हूँ।
[00:17:34] वो चीज जो सिर्फ हमारे होने को नहीं बलके हमारे होने के अंदास को डिफाइन करती है। इस पर हम अगले हफ़ते बात करते हैं तब तक अपना खयाल रखिए। खुदा हफ़ेज।


