What does it mean to tasleem something? More than simply accepting what is, tasleem can mean shades of acknowledgement, surrender, respect and making peace with what cannot be changed. In this episode of Urdunama, Fabeha Syed explores the word through the poetry of Ghalib, Hali, Javed Akhtar, Jigar Moradabadi and Hafeez Jalandhari, and discovers how acceptance can sometimes be its own form of courage.
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[00:00:20] अपनी अम्मा से बात करती हूँ, फोन पर उनसे बात होती है कि भाई क्या किया, क्या खाया, क्या पकाया, तो बताती है कि हमने आज ये पकाया है, वो चीज़ साफ करके रख दी, ये काम कर लिया, ये सैटिंग चेंज कर दी, वहां से वो हटा के उधर रख दिया, शी इस सम�
[00:00:46] अलटी-पलटी रहती है, तो कम से कम खाना पकाने के लिए किसी को रख लीजिये, someone can chop the vegetables, make the rotis, do the basic stuff, she is independent, very good, and obviously I don't want to take that independence away from her, but sometimes I wonder if there is a difference between being independent and refusing to acknowledge that you need a little help, maybe help जो है वो उतनी difficult चीज नहीं है, it is accepting that you need it, और इस acceptance का नाम है,
[00:01:17] तसलीम, but fun fact, तसलीम का मतलब सिर्फ यही नहीं है, सिर्फ acceptance नहीं होता है, इस podcast में तसलीम के मुखतलिफ मतलब, मुखतलिफ माने, आज हम समझेंगे, तो आज का word है तसलीम, start करते हैं,
[00:01:37] दे कुइन पर शुरू हो गया है, उर्दुनामा मेरा नाम है फबेह जायत, आज का word है तसलीम, तसलीम करना, किसी बात को मान लेना, accept करना, किसी हकीकत को acknowledge कर लेना, लेकिन यह जो word है सिर्फ acceptance के लिए नहीं है, तसलीम किसी को सलाम करना भी होता है,
[00:01:56] respectfully greet करना, अपना सर जुकाना, किसी के सामने अपने अदब का इजहार करना, तसलीम है, और फिर इसी word में एक और बहुत गहरा sense है, और वो है surrender का, अपनी मर्जी को थोड़ा पीछे रखके, किसी हकीकत को, किसी फैसले को, या किसी बड़ी गुवत को मान लेना, तसलीम है,
[00:02:24] तो एक ही word में इतने अलग-अलग मतलब है, किसी को सलाम करना, किसी बात को accept करना, और कभी खुद ही को surrender कर लेना, तो तसलीम को शायरी में explore करेंगे, and first up, गालिब, गालिब का शेर, कि हम भी तसलीम की खुव डालेंगे, बेनियाजी तेरी आदत ही सही,
[00:02:53] लेकिन अगले मिस्रे में गालिब क्या कहते हैं, तुमारी बेनियाजी तुमारी आदत है, बेनियाजी तुमारी आदत है, बेनियाजी यानि someone without need or without any dependence, someone who is indifferent, detached, self-sufficient, बेनियाजी तेरी आदत ही सही, तुम परवानी करते हो, distance बना कर रखते हो, तो हम भी तुमारी इस आदत को तसलीम करना सीख लेंगे,
[00:03:21] हम भी तुमारी इस problematic आदत की आदत डालेंगे, तो गालिब, दशायर ड़स नॉट फाइट दी अधर परसन्स बेनियाजी, वो सरेंडर कर रहे हैं उस रियालिटी के आगे जो वो नहीं चेंज कर पाते हैं, और ये जो तसलीम है न, कोई आसान सरेंडर नहीं है, कभी-कभी किसी रियालिटी को मान लेने में पूरी हिम्मत लग जाती है,
[00:03:46] और ये जो पॉइंट है, इसको confirm करते हैं हाली, अलताफ हुसेन हाली, और पॉइंट ये है कि तू सरेंडर, तू जैनुएनली एक्सेट सम्थिंग यू दो आग्सेट, इट कैंट अग्रेट डील आउट आउट अफ यू, हाली लिखते हैं,
[00:04:16] शेवा मीनिंग रूल तरीका, शेवा मीनिंग रूल तरीका, चीज़ों को अकसेट करने का तरीका, सरेंडर करने का तरीका बहुत मुश्किल है, और फिर कहता है शायर, के हम भी आखिर को जी चुराने लगे, यानि हम भी आखिर इस मुश्किल से बचने लगे, इससे कतराने लगे, यह जो तसलीम का पहलू है, इसमें बहुत ही इंट्रिस्टिंग है,
[00:04:44] अकसेट कर लेना साउंड्स वरी पैसिफ, एफ़र्टलेस, लेकिन हाली कहते हैं, कि नहीं, तो सरेंडर, तो जेनुरिलली अकसेट समथिंग, यू दोंट वांट वांट आखिर इसमें, यू जो एक पैसेट के लिए बात कह रहे हैं,
[00:05:13] कि किसी चीज को मान लेने में, जावेद अख्तर की नजम सुनिये, अजीब किस्सा, ये नजम थोड़ी लंबी है, और तसलीम को एक अलग ही सेंस में लेके चले जाती है, अलग ही डिरेक्शन में लेके चले जाती है नजम, दो लोग हैं, अपनी एक दुनिया बना लेते हैं, एक ऐसी दुनिया, जो बाकी दुनिया की नजरों से दूर है, सीक्रेट वर्ल्ड, दोनों के खवाफ, दोनों की खाहिशात, दोनों की जिन्दगी इस दुनिया में साथ चल रही होती हैं,
[00:05:42] फिर जब मालूम पड़ता है, लोगों को के भई, ऐसी इन्होंने अपनी जिन्दगी बना ली है, सीक्रेट वर्ल्ड में रहते हैं, फिर वहाँ पे रेजिस्टेंस शुरू होता है, लोग नाराज होते हैं, लेकिन आखिर में दुनिया हार जाती है, और तब तक काफे देर हो चुकी होती हैं, क्या होता है एंड में, जिसे हम रीडर्स को पता लगता है कि हाँ भी, इस टू लेट, नजम पढ़ते हैं, जावे दख्तर की नजम अजीब किस्सा है, अजीब किस्सा है,
[00:06:11] जब ये दुनिया समझ रही थी, तुम अपनी दुनिया में जी रही हो, मैं अपनी दुनिया में जी रहा हूँ, तो
[00:06:43] सुकून का गहरा एक समंदर था और हम थे। अजीब कस्सा है। सारी दुनिया ने जब ये जाना कि हमने सारी निगाहों से दूर एक दुनिया बसाई है तो हर एक आबरून जैसे हम पर कमान तानी।
[00:06:59] तमाम पेशानियों पे उबरी गम और गुसे की गहरी शिकने किसी के लहजे से तलखी छलकी, किसी की बातों में तुर्शी आई। किसी ने चाहा कि कोई दिवार ही उठा दे, किसी ने चाहा हमारी दुनिया ही वो मिटा दे।
[00:07:15] मगर जमाने को हारना था, जमाना हारा, ये सारी दुनिया को मानना पड़ा, हमारे खयाल कि एक सी जमी है, हमारे खाबों का एक जैसा ही आसमा है, मगर पुरानी ये दास्ता है, कि हम पे दुनिया अब एक अरसे से महरबान है।
[00:07:45] अजीब कस्सा है, जबकि दुनिया ने कब का तसलीम कर लिया है, हम एक दुनिया के रहने वाले हैं।
[00:08:01] यहां तसलीम का मतलब क्या हुआ? दुनिया ने आखर मान ही लिया, कंसीट कर लिया, कि हाँ, ये दोनों एक ही दुनिया के रहने वाले हैं, they belong together. लेकिन अब देखें नजम का ट्विस्ट, दुनिया ने जिस बात को तसलीम करने में इतना वक्त लगाया, जब तक वो मानने क
[00:08:17] लिए तयार हुए, तब तक वो हकीकत खुदी बदल चुकी थी. तब तक दो लोग who belonged together, they were no longer together, वो separate हो चुके थे. तुम अपनी दुनिया में जी रही हूँ, मैं अपनी दुनिया में जी रहा हूँ. यानि दुनिया ने फाइनली उन दोनों को एक दुनिया का हिस्सा मान ल
[00:08:47] के गुजर जाने के बाद, तो reality क्या की क्या हो जाती है. जिगर मुरादाबादी का अफशेर आपको सुनाएंगे के हर इशारे पर है फिर भी गर्दने तसलीम खम, जानता हूँ, साफ धोके दे रहा है दिल मुझे. यह जो शेर है, इसमें surrender सिर्फ एक emotional state नहीं रहता है. व
[00:09:20] हर इशारे पर है फिर भी गर्दने तसलीम खम, जानता हूँ, साफ धोके दे रहा है दिल मुझे. गर्दने तसलीम खम का मतलब, यानि तसलीम में गर्दन जुकी हुई है, हर इशारे पर सर जुक जाता है बिना किसी resistance के. लेकिन आप ये देखिए, शायर को सब पता है, जा
[00:09:50] उमीदों को वो सच समझ रहा है, उन में कुछ ऐसा है जो गुमरह कर रहा है शायर को, he knows it and yet. दिल के हर इशारे पर उसकी गर्दन जुक जाती है, यानि problem ये नहीं है कि शायर को समझ नहीं आ रही हैं बाते, he knows better and yet he surrenders. दिल की बात को माल देने के लिए उसे अपनी reasoning को convince करन
[00:10:17] नहीं होता है तसलीम, कभी कभी तसलीम का मतलब है सच समझते हुए भी अपने आपको किसी चीज के हवाले कर देना और सच discomfort है यहां पे, किसी unpleasant चीज को जानते हुए, उस truth को पहचानते हुए और इस सब के बावजूद अपने आपको आप उसके हवाले करें हैं.
[00:10:43] जावेद अख्तर के यहां दुनिया एक हकीकत को तसलीम करती है, उनकी जो नजम पड़ी थी, अजीव किसा है, और हाली का जो शेर हमने पढ़ा था, वहां तसलीम करना सख्त मुश्किल था इस कदर के उसका भी दिल परेशान हो गया था, उस सरेंडर में. और जिगर मुरादबादी के यहां उनके शेर में, इनसान जानता है कि दिल धोका दे रहा है, फिर भी उसके सामने उसने गर्दन छुका दी है.
[00:11:06] अब जो आपको शेर सुना रही हूँ, हफीज जलंधरी का, इस शेर पे आते आते जो तसलीम की शकल है, जो अभी तक हमने पॉड्कास्ट में देखी है, वो बिल्कुल अलगी लेवल पे चली जाती है. यहां तसलीम किसी रिलेशन्शिप को एकसेप्ट करना नहीं है, किसी इनसान के सामने सरेंडर करना नहीं है, यहां इस शेर में अपनी जिन्दगी को, अपने खिसमत को अल्टिमेटली डिवाइन विल के हवाले कर देना है, हफीज जलंधरी का शेर.
[00:11:31] लिखते हैं कि ना पूछो हाल मेरा कुछ ना पूछो, कि तसलीम और रजा है और मैं हूँ. तसलीम और रजा एक साथ आया है. तसलीम, सरेंडर, रजा यानि कि जो है उस पर दिल का राजी होना.
[00:11:55] सिर्फ ये कह देना नहीं है कि ठीक है जो होना था होगा, बट अच्छली रेचिए रजा रजा रजा रजा रजा इसले शायर कहता है, ना पूछो हाल मेरा. जैसे अब अपने हाल को एक्स्प्लें करने की भी उसमें हिम्मत नहीं है. और शायद तसलीम का सबसे ब्यूटिफल पाफुल वर्जिन यही है.
[00:12:24] अप उससे बस लड़ना चोड़ देते हैं और उसके साथ जीना सीख लेते हैं. अब अब अच्छी ने लेकर हाली, जावेद अखतर, जिगर और अब हफीज जलंधरी. तसलीम ने हमें acceptance के कितने different shades दिखाएं हैं. किसी और की बेनियाजी को मान लेना, अपनी resistance छोड़ देना, दिल के सामने surrender कर देना,
[00:12:49] और आखिर में अपनी पूरी जिंदगी को एक बड़ी قوت के हवाले कर देना, इस सब तसलीम है. और प्राबबली सब के बाद, जब सारे control आप छोड़ देते हैं, सारे कुवत अपनी छोड़ देते हैं, वो ही point है जब आप सुकून असली peace महसूस करते हैं. तो मैं भी इसी point पे आपको छोड़ रही हूं. अगले हफ़ते आकर मिलती हूं. हयाल रकी, खुदा हफ़स.


