हिरण्यकशिपु के वंश में सुंद और उपसुन्द नाम के दो भयानक दैत्य हुए। दोनों भाई एक-दूसरे की परछाई की तरह थे। उन्होंने त्रिलोकों पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से विंध्याचल पर्वत पर जाकर वर्षों ब्रह्मदेव की तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर जब ब्रह्मदेव ने उनसे वरदान मांगने को कहा तो उन्होंने अमर होने का वरदान माँगा। जब ब्रह्मदेव ने कहा की ऐसा वर देना सृष्टि के नियमों के विपरीत है तो उन्होंने वरदान माँगा की उनकी मृत्यु एक-दूसरे के हाथों ही हो।
ऐसा वरदान मिलने पर दोनों दैत्य और भी ज्यादा उत्पात करने लगे और तीनों लोकों के वासियों पर अत्याचार करने लगे। सभी देवगणों ने ब्रह्मदेव के पास जाकर उनसे मुक्ति का उपाय पूछा तो ब्रह्मदेव ने विश्वकर्मा को आदेश देकर एक अलौकिक सुंदरी बनाने को कहा। विश्वकर्मा जी ने सारे संसारों के सर्वश्रेष्ठ रत्नों से तिल-तिल जोड़कर एक सुन्दर अप्सरा का निर्माण किया और उसे तिलोत्तमा नाम दिया। ब्रह्माजी ने तिलोत्तमा को आदेश दिया की वो सुंद और उपसुन्द में विवाद करा दे।
तिलोत्तमा इस प्रकार आदेश पाकर जिस वन में सुंद और उपसुन्द विश्राम कर रहे थे वहाँ गयी। जैसे ही दोनों दैत्यों ने तिलोत्तमा को देखा वो उसे पाने के लिए आपस में लड़ने लगे और एक-दूसरे से इस प्रकार द्वंद्व करते हुए मृत्यु को प्राप्त हुए।
महाभारत में यह कथा देवर्षि नारद ने पांडवों को उनके द्रौपदी से विवाह के पश्चात् सुनाई थी जिससे उनमें कभी भी द्रौपदी को लेकर आपसी मतभेद न उत्पन्न हो।
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