एक दिन विंध्याचल पर्वत ने सूर्यदेव को कहा कि वो सदा सुमेरु की परिक्रमा करते हैं, कभी उनकी भी परिक्रमा करें। सूर्य ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता।
इस पर विंध्य को बहुत क्रोध आया और वो अपना आकार बढ़ाने लगे। बढ़ते-बढ़ते विंध्याचल पर्वत इतना बड़ा हो गया कि सूर्य का प्रकाश धरती पर पहुँचना बंद हो गया। बिना सूर्य के प्रकाश के संसार में जीवन की हानि होने लगी।
सभी देवताओं ने पुलस्त्य प्रजापति के पुत्र अगस्त्य मुनि से जाकर प्रार्थना की कि वो किसी प्रकार विंध्याचल को शान्त करें।
अगस्त्य मुनि विंध्याचल के पास गए और उनसे दक्षिण की ओर जाने के लिए रास्ता माँगा। विंध्य ने झुककर ऋषि को जाने का रास्ता दे दिया। ऋषि अगस्त्य ने अपने वापस आने तक विंध्य को प्रतीक्षा करने को कहा।
उसके बाद अगस्त्य ऋषि दक्षिण में ही रह गए और कभी वापस नहीं आये। विंध्याचल आज भी ऋषि अगस्त्य की प्रतीक्षा में झुका हुआ है।
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