मोरगांव गणपति मंदिर
पुणे शहर के निकट स्थित मोरगांव गणपति मंदिर अष्टविनायकों में सर्वप्रथम माना जाता है। यहां मोर पक्षी पर आरूढ़ भगवान् गणेश की प्रतिमा की अर्चना की जाती है।
गणेश पुराण में वर्णित मान्यताओं के अनुसार मिथिला नरेश चक्रपाणि और उनकी पत्नी उग्रा बहुत दिनों तक निसंतान रहने के बाद भगवान् सूर्य की आराधना कर एक तेजस्वी पुत्र को प्राप्त किया। उस पुत्र का नाम उन्होंने सिंधु रखा। सिंधु अपने साथ एके अमृत कलश लेकर पैदा हुआ था, जिसके कारण जब तक वह कलश अक्षुण्य रहता, तब तक सिंधु की मृत्यु असम्भव थी। कलश को सदैव बचाए रखने हेतु सिंधु ने उसे निगल कर आपने पेट में छुपा लिया।
अमरता पाने के कारण सिंधु अब अत्यधिक दुराचारी हो गया। उसके अत्याचार से प्रजा में हाहाकार मच गया। साधारण मानवों के साथ-साथ सिंधु ने कई देवताओं को भी युद्ध में परास्त कर बंदी बना लिया। अंततः सिंधु से देवपुरी की रक्षा करने हेतु देवगण भगवान् श्रीगणेश के पास गुहार लेकर पहुंचे।
कहते हैं इसी स्थान पर भगवान् गणेश, मयूर पक्षी पर आरूढ़ होकर पृथ्वी लोक पर आए थे और सिंधु के पेट में रखे हुई अमृत कलश को तोड़ कर उसका वध किया था। उसी दिन से मोर पर आरूढ़ भगवान् गणेश के मयूरेश्वर रूप की उपासना यहां पर की जाती है।
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