जब ऋषि अगस्त्य दक्षिण भारत की ओर जा रहे थे तो उन्होंने अपने कमंडल में देवनदी गंगा का पानी रख लिया।
रास्ते में भगवान गणेश ने एक कौए का रूप धारण कर उनके कमंडल में छेद कर दिया और उस छेद से ऋषि के कमंडल का गंगाजल बह निकला।
ऋषि अगस्त्य के कमंडल से निकली उसी जलधारा को कावेरी नदी के नाम से जानते हैं और गंगाजल से बने होने के कारण उसे दक्षिण की गंगा भी कहते हैं।
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