महाराज पुरुरवा के पुत्र आयु ने वर्षों भगवान दत्तात्रेय की सेवा कर उनसे वरदान स्वरूप एक पुत्र प्राप्त किया, जिसका नाम नहुष रखा। जन्म के कुछ समय बाद ही राक्षस हुंड ने नहुष का अपहरण कर लिया था, क्योंकि एक भविष्यवाणी के अनुसार नहुष हुंड का वध कर भगवान शिव और माता पार्वती की पुत्री देवी अशोकसुंदरी को उसके चंगुल से छुड़ाते।
हुंड के महल की एक दासी ने बालक नहुष को बचाकर गुरु वशिष्ठ के सुपुर्द कर दिया। गुरु वशिष्ठ ने नहुष को अपने संरक्षण में बड़ा किया और उसे धर्म, वेद और शस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा दी। बड़े होकर नहुष ने हुंड का वध कर देवी अशोकसुंदरी को उसके चंगुल से छुड़ाया और उनसे विवाह किया।
नहुष ने सम्पूर्ण पृथ्वी पर अपना राज्य स्थापित कर राजसूय यज्ञ का आयोजन किया। उनकी महानता के कारण ही जब इन्द्र स्वर्ग का सिंहासन छोड़कर भाग गए थे तब समस्त देवताओं और ऋषियों ने नहुष को इन्द्र के पद के लिए चुना।
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