बल्लालेश्वर विनायक - रायगढ़

बल्लालेश्वर विनायक - रायगढ़

महाराष्ट्र के रायगढ़ जिला में स्थित बल्लालेश्वरजी को अष्टविनायकों में तृतीय माना जाता है। इस मंदिर का आकार “श्री” के आकार का है, जिसके दोनों ओर बड़े-बड़े तालाब हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार पाली गांव में कल्याण और इंदुमति नाम के एक सेठ दंपति रहते थे। उनका बल्लाल नाम का इकलौता पुत्र श्रीगणेश का परमभक्त था। उसकी भक्ति से सेठ खुश नहीं थे, क्योंकि भक्ति में मग्न उनका बेटा व्यवसाय में कोई विशेष रुचि नहीं लेता था। एक बार कल्याण सेठ गुस्से में बल्लाल को ढूंढने निकले तो वह जंगल में गणेश जी की आराधना करते हुए मिला। उन्होंने उसे खूब पीटा और गणेशजी की प्रतिमा खंडित करते हुए दूर फेंक दिया। इसके बाद उसे वहीं जंगल में एक वृक्ष से बांध कर ये कह कर छोड़ गए की भूखे प्यासे रह कर उसकी अक्ल ठिकाने आ जायेगी। सेठ के जाने के बाद बल्लाल की भक्ति से प्रसन्न श्री गणेश उसके समक्ष एक ब्राह्मण के वेश में प्रकट हुए और उसे बंधन मुक्त कर के वरदान मांगने को कहा। इस पर बल्लाल ने उनसे अपने क्षेत्र में स्थापित होने का अनुरोध किया। श्री गणेश ने उनकी इच्छा पूरी करते हुए स्वयं को एक पाषाण प्रतिमा में स्थापित कर लिया और तब उस स्थान पर बल्लाल विनायक मंदिर बनाया गया। Learn more about your ad choices. Visit megaphone.fm/adchoices

महाराष्ट्र के रायगढ़ जिला में स्थित बल्लालेश्वरजी को अष्टविनायकों में तृतीय माना जाता है। इस मंदिर का आकार “श्री” के आकार का है, जिसके दोनों ओर बड़े-बड़े तालाब हैं।

 

पौराणिक कथाओं के अनुसार पाली गांव में कल्याण और इंदुमति नाम के एक सेठ दंपति रहते थे। उनका बल्लाल नाम का इकलौता पुत्र श्रीगणेश का परमभक्त था। उसकी भक्ति से सेठ खुश नहीं थे, क्योंकि भक्ति में मग्न उनका बेटा व्यवसाय में कोई विशेष रुचि नहीं लेता था। एक बार कल्याण सेठ गुस्से में बल्लाल को ढूंढने निकले तो वह जंगल में गणेश जी की आराधना करते हुए मिला। उन्होंने उसे खूब पीटा और गणेशजी की प्रतिमा खंडित करते हुए दूर फेंक दिया। इसके बाद उसे वहीं जंगल में एक वृक्ष से बांध कर ये कह कर छोड़ गए की भूखे प्यासे रह कर उसकी अक्ल ठिकाने आ जायेगी। सेठ के जाने के बाद बल्लाल की भक्ति से प्रसन्न श्री गणेश उसके समक्ष एक ब्राह्मण के वेश में प्रकट हुए और उसे बंधन मुक्त कर के वरदान मांगने को कहा। इस पर बल्लाल ने उनसे अपने क्षेत्र में स्थापित होने का अनुरोध किया। श्री गणेश ने उनकी इच्छा पूरी करते हुए स्वयं को एक पाषाण प्रतिमा में स्थापित कर लिया और तब उस स्थान पर बल्लाल विनायक मंदिर बनाया गया।

 

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