एक बार भगवान् शंकर और माता पार्वती मेरु पर्वत पर नंदनवन में विहार कर रहे थे और वे इच्छापूर्ति करने वाले कल्पवृक्ष के पास रुके।
पार्वती जी ने कल्पवृक्ष से उनके अकेलेपन को दूर करने के लिए एक पुत्री की इच्छा प्रकट की। कल्पवृक्ष ने उनकी इच्छा पूर्ण करते हुए उनको एक सुन्दर पुत्री प्रदान की जिसका नाम अशोकसुन्दरी रखा, क्योंकि उस सुंदरी का जन्म माता पार्वती का शोक हरण करने के लिए हुआ था।
बाद में उनका विवाह पुरुरवा के पौत्र चंद्रवंशी राजा नहुष के साथ हुआ और यति और ययाति नामक पुत्र हुए।
देवी अशोकसुन्दरी की कथा का वर्णन पद्म पुराण में मिलता है। देवी को बाल त्रिपुरा सुंदरी के नाम से भी जाना जाता है।
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