गणेश पुराण में, शौनक जी, सूत जी से गणेश जी के गजानन होने की कथा पूछते हैं। सूत जी उन्हें वही कथा सुनाते हैं जो नारायण ने नारद मुनि को सुनाई थी।
एक बार देवराज इन्द्र पुष्पभद्रा नदी के शान्त और सुन्दर तट पर थे। उस निर्जन क्षेत्र में कई सुन्दर पुष्प और वृक्ष लगे हुए थे।
अभी इन्द्र देव इस मनोहर क्षेत्र को देख ही रहे थे तभी उन्हें घास पर लेटी हुई रम्भा दिखाई दी। रम्भा को देखते ही इन्द्र देव वासना से लिप्त हो गए और रम्भा से उनकी नज़र नहीं हटीं। रम्भा को ऐसा भान हुआ कि कोई उसे देख रहा है तो वह अपनी जगह से खड़ी हुई और उसका ध्यान इन्द्र देव की तरफ़ गया। रम्भा भी इन्द्र देव की तरफ़ आकर्षित हुई और उनकी तरफ़ बढ़ने लगी।
जैसे ही रम्भा, इन्द्र देव के निकट पहुँची उन्होंने पूछा, "हे मनमोहनी! तुम कौन हो? तुम कहाँ से आई हो और कहाँ जा रही हो? क्या तुम मेरा एक काम करोगी?"
रम्भा इन्द्र की बात सुनकर लजा गई और बोली, "देव! मैं तो आपकी दासी हूँ। आप जो कहेंगे, मैं वही करूँगी।"
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