Why We Fall for Fareb? Urdu Poetry on Deception, Trust and Hope
UrdunamaJune 27, 202600:11:14

Why We Fall for Fareb? Urdu Poetry on Deception, Trust and Hope

A salesperson can sell you a dream. Social media can sell you a lifestyle. Sometimes, your own heart sells you hope. That's fareb. Often translated as deception, fareb isn't quite the same as dagha. A stranger can deceive you; only someone you trust can betray you. Through the poetry of Fana Nizami Kanpuri, Mirza Ghalib, Bahadur Shah Zafar and Momin Khan Momin, we explore false promises, self-deception and why the hardest illusions to let go of are often the ones we create ourselves. Tune in. Learn more about your ad choices. Visit megaphone.fm/adchoices

A salesperson can sell you a dream. Social media can sell you a lifestyle. Sometimes, your own heart sells you hope. That's fareb.

Often translated as deception, fareb isn't quite the same as dagha. A stranger can deceive you; only someone you trust can betray you. Through the poetry of Fana Nizami Kanpuri, Mirza Ghalib, Bahadur Shah Zafar and Momin Khan Momin, we explore false promises, self-deception and why the hardest illusions to let go of are often the ones we create ourselves. Tune in.

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[00:00:05] The Quint पे शुरू हो गया है, Urdunama मेरा नाम है फबिहा सयाद, यह टू पार्ट सीरीज एपिसोड है, जिसमें हम बिट्रेयल और डिसेप्शन की बात करें हैं, बिट्रेयल यानि दगा जिसमें हमने पिछले एपिसोड में बात कर ली, इस बार हम बात कर रहे हैं, आज की एपिस

[00:00:35] मतलब कोई गलत चीज जिस पे यकीन नहीं करना चाहिए, पर आप कर लेते हैं, तो फरेब खा लेते हैं, खैर शायरी पे आते हैं, फना निजामी कानफुरी का शेर है, कि तेरे वादों पे कहां तक मेरा दिल फरेब खाए, कोई ऐसा कर बहाना मेरी आस टूट जाए, आपन

[00:01:08] जैसे धोखा खाते हैं, वैसे फरेब खा लिया, इंग्लिश में आप डिसीव हो सकते हैं, फूल्ड इस्तिमाल किया जाता है, यू में बी कॉंड, लेकिन उर्दू में आप फरेब खाते हैं, जैसे धोखा कोई चीज हो, जो बार-बार आपके सामने रखा जा रहा है, और �

[00:01:24] अप पर कोई सेल्फ कंट्रोल है नहीं, इसलिए चलिए एक और निवाला सही, एक और बाइट सही, तो फरेब खाना इसे कहते हैं, इसलिए मुझे लगता है कि इस शेर में जो फोकस है, महबूब, यानि उस धोके बाज महबूब पर कम हैं और दिल पर ज्यादा है, आशाय

[00:01:57] लाइज विद माई दिल, मैं ही तुम पे यकीन किये जा रहा हूँ, जबके मुझे नहीं करना चाहिए, और फ्रांकली ऐसे कई मोमें जाते हैं, जब साइन्स साफ नजर आ रहे होते हैं, लेकिन उस टाइम पर आँखों पर हरे रंग का परदा पर जाता है, इसलिए जो ला

[00:02:27] पर आशिक वसल की उमीद के सहारे जीता है, एक मुलाकात, एक पैगाम, कोई पॉजिटिव साइन, कोई इंडिकेशन के कहानी भी खत नहीं हुई है, लेकिन यहाँ शायर उमीद से छुटकारा मांग रहा है, वो कह रहा है, अगर जाना है, तो इतनी वजाहत से जाओ कि मेर

[00:02:47] इंतिजार ही खतम हो जाए, अगली बार इंतिजार ना करूँ, मुझे अपने एक्सक्यूज़ में मतल जाओ के, हर बार तुम वाइदा खिलाफी करते हो, हर बार कोई नया बहाना देते हो, हर बार मेरा दिल उस बहाने को एकसेप भी कर लेता है, somehow hope finds a way to renew itself, which is very wrong. तो इसलि

[00:03:21] इसलिए प्राइब की खता है, हमें लगता है कि फरेब इन्फिक्टिट पेंट जो है, तभी खतम होगा, जब रिटन कोई अपालोजी आएगी या कोई फाइनल डेक्लिरेशन आएगा, उसकी तरफ से जिसने दिल तोड़ा है, वाट ऐसा नहीं होता है, तो जिसे हम फरेब

[00:03:37] कहकर दूसरे पर सारा इलजाम डाल देते हैं, वो दरसल हमारी अपने विश्फिल थिंकिंग होती है, सामने वाला तो अपनी रवाईयों से, अपनी प्रायॉरिटी से, अपनी गहर हाजरी से बार-बार कम्यूनिकेट कर रहा है, पैटर्न्स पे पैटर्न्स आपके सामने व

[00:04:05] डायलॉग याद आ रहा है, कि उमीद तूटने से डर नहीं लगता, उमीद बांधते हुए खौफ आता है, क्योंकि जब उमीद तूटती है, कहानी खत्म हो जाती है, लेकिन जब उमीद बंधी रहती है, तो कहानी भी चलती रहती है, तो डिसाइड कीजिए, कि कहानी खत् इसी तरह वादा खिलाफे पर गालिब का एक शेर है जो मुझे लगातार यादा रहा है

[00:04:35] कि तेरे वादे पे जीए हम तो ये जान जूट जाना कि खुशी से मर ना जाते अगर एतबार होता यानि हम तुम्हारे वादों के सहारे तो जीते रहे लेकिन अब लगता है कि दिल को कहीं न कहीं पता था कि ये वादे पूरे नहीं होने वाले क्योंकि अगर वादे एतबार हो जाता अगर यकीन होता कि तुम अपना वादा निभाओगे तो इंतिजार अतना लंबा और अतना तकलीव देना होता

[00:05:02] हमें इतनी खुशी मिलती इतनी खुशी मिलती कि हम मरी जाते है फ़ना निजामी और मुर्जा गाले का जो शेर है तो उन्हों में एक ही common theme है दोनों जगा मसला सिर्फ वाइदा खिलाफी का नहीं है मसला उस emotional limbo का है जहां इनसान लटका रहता है ना पूरी तरह उम्मी छोड़ पाती है ना पूरी तरह यकीन कर पाता है कि सब कुछ खतम हो गया है

[00:05:31] तो यह जो बर्जख का आलम है कि ना इधर के रहे ना उधर के रहे वो बड़ा ही ज्यादा frustrating होता है पर इट्स गूर डट गालिब नूस ना कुछ कमी हमारे समझने में भी है लिखते हैं

[00:06:00] उसे चाहा था मैने के रोक रखू मेरी जान भी जाए तो जाने न दू कि ये लाग फरेब करोड फुसू ना रहा ना रहा ना रहा ना रहा पहले मिस्रे में महबबत की शिद्दत देखिए कि मैं अपनी जान दे देता बस उसे जाने ना देता उसे चाहा था मैने के रोक रखू मेरी जान भी जाए तो जाने ना दू दूसरे मिस्रे में अचनक लہजा बदल जाता है

[00:06:30] कि ये लाग फरेब करोड फुसू फुसू जादू जादूमंतर यहां फरेब किसी और को दिया हुआ धोका नहीं है यह वो तमाम चीजें हैं जो इनसान मजबूरी में अख्तियार करता है जब उसे लगता है कि शायद वो तकदीर को हरा देगा इसलिए जो बन पड़ती है वो करता है तो अपने बारे में शायर कहता है कि मैंने लाग फरेब किये उसे रोकने के करोड फुसूं किये फुसूं यानि एंचांटमेंट

[00:06:57] यह लफ्स इस बेबसी को और गहरा कर देता है जैसे शायर कह रहा हो मैंने सिर्फ हर फ्रैक्टिकल कोशिश नहीं किया है अगर जादू भी होता वो भी शायर मैं कर लेता जब इनसान के पास इक्तियार खतम हो जाता है तो वो हर चीज जो करना चाहता है डैस्पिरेशन में कर देता है उसे ये समझ आता ही नहीं कि क्या सही है उस वक्त क्या गलत है फिर लिखते हैं ना रहा ना रहा ना रहा ये जो तक्राव Mhm बार बार जो रेपिटेशन है

[00:07:24] ना रहा ना रहा इसमें बहुत ही फ्रिस्टरेशन है जैसे हर ना रहा के साथ शायर ह्कीषकत कियो दो बार एकसेट करने की कोशिश कर रहा हो कि वो चला गया, वो चला गया, मेरी लाग कोशिश के बाद वो चला गया जफर के यहाँ फरेब का मतलब किसी और को डिसिव करना नहीं जैसे अभी आपको मैंने बताया by यकीन कर लियना है आपकी रियालिटी से कहीँ ज्यादा अलग है

[00:07:51] हो सकता है वो मुहबत आपके रियालिटी में हो भी नहीं जिसे आप जबरदस्ती खेंच के इन्वाल्फ करने की कोशिश कर रहे हैं अपनी जिन्दकी में तो इस तरह के बहुत ही कड़वे कसेले मोमेंट्स होते हैं वो हमें बस यही लेसन देते हैं

[00:08:04] अपने लेसन दोड़ रहे थे इसलिए पीछे हट जाएं और जहां दोड़ना है वहां दोड़ लगाई है अब मोमिन खान मोमिन का शेर है के सूझ हे क्यों कर फरे विदिलदारी

[00:08:33] अश्च दिलदारी यानि महबद जताना, affection, warmth और आश्णा नुमा क्या है? आश्णा यानि familiar जाना पहचाना नुमा, something that appears like आश्णा नुमा मतलब something that looks like a friend but may not actually be one तो मोमिन इसमें कहते हैं फरे बिदिलदारी समझ ही कैसे आए? इश्च तो दुश्मन होते हुए भी आश्णा नुमा है

[00:09:00] सूझ है क्यों कर फरे बिदिलदारी? सूझना समझना, okay? ये problem नहीं है कि इश्च दुश्मन है, problem ये है कि वो दुश्मन की तरहा introduce ही नहीं हुआ इसलिए शायर यहाँ पर समझी नहीं पाया कि वो जो दोस्ती का हाथ है वो दोस्त नहीं है, वो दुश्मन है इसलिए कहते हैं कि अगर कोई stranger आकर आपको manipulate करे, आप शायद होश्यार हो जाएं

[00:09:26] लेकिन जब वही बात बड़े care, concern, एक दू आसू टपका के affection के लिबास में एक दम नर्मी के साथ आपसे कोई कहें तो आप उस पर यकीन नहीं करेंगे तो और क्या करेंगे? और मुझे लगता है मुमिन खान, मुमिन ना इश्ख की बात करते करते, इनसानी फित्रत की बात करेंगे हैं

[00:09:47] और इसलिए फरेब का जो रिष्टा है, अजनभियत यानि unfamiliarity से कम है, गुर्वत यानि closeness, intimacy अपने पन से ज्यादा है क्योंकि किसी stranger की बात पर हम वैसे भी एहतियाद करते हैं, लेकिन अपनों की बातों पर थोड़ी करेंगे जितना ज्यादा अपना पर महसूस होता है, उतनी ही कम हम guarded रहते हैं

[00:10:10] मुमिन खान मुमिन का कमाल ये है, कि दोनों मिसरे जो आपने सुने हैं, इन दोनों में वो इश्क को villain भी बना रहे हैं और victim भी क्योंकि इश्क दुश्मन भी है, लेकिन उसका पूरा असर इसी बात में है, कि वो कभी दुश्मन लगता ही नहीं और यही है classic फरेब, not that love hurts, but that it first convinces you that it never will

[00:10:35] फिर से याद दिला दूं दगा की, अगर last episode मिस कर दिया है तो सुन लीजिएगा दगा पर episode था, फरेब तभी तक होता है जब तक वो गुम्रा करता रहे लेकिन जब वो पहले आपको trust दे, comfort दे, आपका एतबार जीते और फिर दिल तोड़े, फिर धोखा दे तो उसे दगा कहते हैं सूझे क्यों कर फरेब दिलदारी, दुश्मनाश ना नुमा है इश्ग तो सतर्क रही आप भी साफधान रही अगले हफ़ते मिरते हैं, ख़दाफिस