What Does 'Naseeb' Really Mean? Urdu Poetry on Fate, Destiny and the Things We Can't Explain
UrdunamaJuly 04, 202600:11:44

What Does 'Naseeb' Really Mean? Urdu Poetry on Fate, Destiny and the Things We Can't Explain

Why do two equally qualified people end up with completely different careers? Why does one marriage survive while another falls apart? Why do some people seem to meet the right person at the right time, while others do everything "right" and still don't get the life they hoped for?When we run out of explanations, we often reach for one word: naseebIn this episode of Urdunama, Fabeha Syed explores one of Urdu's most layered words through the poetry of Nida Fazli, Ahmed Faraz and Sudarshan Faakir. More than fate or destiny, naseeb is the language of uncertainty, it is the word we use to make sense of life's unexpected turns, heartbreaks, missed chances and inexplicable blessings. But does naseeb really explain anything, or does it simply help us live with the questions? Tune in. Learn more about your ad choices. Visit megaphone.fm/adchoices

Why do two equally qualified people end up with completely different careers? Why does one marriage survive while another falls apart? Why do some people seem to meet the right person at the right time, while others do everything "right" and still don't get the life they hoped for?
When we run out of explanations, we often reach for one word: naseeb
In this episode of Urdunama, Fabeha Syed explores one of Urdu's most layered words through the poetry of Nida Fazli, Ahmed Faraz and Sudarshan Faakir. More than fate or destiny, naseeb is the language of uncertainty, it is the word we use to make sense of life's unexpected turns, heartbreaks, missed chances and inexplicable blessings. But does naseeb really explain anything, or does it simply help us live with the questions? Tune in.

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[00:00:03] एक सवाल ऐसा है जो मैं बच्पन में तो करती थी, अब ज्यादा करती हूं, कि जो रंग के नाम हैं, अगर हम उन्हें उस नाम से ना बुलाएं, तो फिर क्या करें? लाल रंग को लाल नहीं कहेंगे, तो क्या कहेंगे? कास्टनी को कास्टनी नहीं कहेंगे, तो फिर क्या कहे

[00:00:19] उसी तरह जो हम महसूस करते हैं, खुशी, गुसा, रंज, अगर ये नाम इन इमोशन्स के लिए हम ना इस्तेमाल करें तो फिर क्या करेंगे, इस फैसिने यह लगता है किसी ने डिसाइट कर लिया कि वे इन जीजों को यही कहा जाएगा और हमने मान लिया, किसी ने हमको पू

[00:00:48] कुछ हम देखते हैं, महसूस करते हैं, जिस कैफियत से हम गुजरते हैं, उन सब को एक नाम दे रखा है, एक शकल दे रखी है, ताके हम उनके बारे में बात कर सकें, इसलिए हर उस चीज के लिए लफ्ज हैं, जिसे हम explain कर सकते हैं, लेकिन इंट्रिस्टिंग बात यह है, क

[00:01:17] अर उर्दु में इसे समझें, तो मुकदर, तकदीर जैसे words कहके हम आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन नसीब, जो word है, यह सिर्फ इतना ही नहीं है, बहुत गहरा है, इसमें एक तरह की तसलीम है, admission है, that I don't know why this happened, और आज बात इसी I don't know why this happened की होगी, यानि कि नसीब, which means, قسمत,

[00:01:38] destiny, fate, the quint पर आप सुन रहे हैं, उर्दु नामा मेरा नाम है फबिह सेयद, नसीब, अंग्रेजी में अभी बताया, fate या destiny कह सकते हैं, उर्दु में यह उस हिस्से को भी कह सकते हैं, जो जिन्दगी ने आपके लिए मुकरर किया है, चाहे वो खुशी हो, या घम हो, किसी को �

[00:02:00] बिना ज्यादा मेहनत की ये सब कुछ मिल जाए, तो कहते हैं, वा, क्या नसीब पाया है, कोई पूरी जान लगा दे और फिर भी बात ना बने, तब भी कहते हैं, क्या नसीब पाया है, दो लोग एक ही जगा से शुरुआत करते हैं, एक को खुब कामियाबी मिलती है, आसमा

[00:02:17] चूले वो, और दूसरा वही का वही रह जाए, तब भी कहते हैं, क्या नसीब पाया है, अब बंबई में बारिशें नहीं हो रही थे, ऐसा लग रहा था, बंबई के नसीब में इस साल बारिशें हैं ही नहीं है, बहुत कम होंगी, पर देखिए, एक हफते ऐसे जम के बारि

[00:02:31] चूई, जो हमारा पवाई लेक है वो ओवर्फलो कर रहा है, लेकिन नलो में सुना है, पानी अब भी बड़ा कमा रहा है, खैर नसीब पे वापस आते हैं, वाकि कोई चीज पहले से लिखी होती है के नहीं, ये फिलोसफी की बात है, फिलोसफी की बात है, ये जो बहस है न

[00:03:01] जिनका कोई explanation नहीं है आपके पास, कोई logic भी नजर नहीं आती उसके पीछे, तो उसे हम नसीब कहके आगे बढ़ जाते हैं, शायद इसलिए जो life है हमारी, उसके सबसे बड़े setbacks के साथ ये loves बार बार सुनाई देता है,

[00:03:16] failed marriages, अचानक tragedies का होना, अच्छे खासे पुखता रिष्टों का तूट जाना, या ऐसे वाकियात का होना, जो एक पल में पूरी जिन्दगी का रुख बदल देते हैं, जब वज़ा समझ नहीं आती है तो हम कहते हैं, नसीब.

[00:03:34] तो हम नसीब की बात करेंगे, शायरी पे आएंगे, निदाफाजली के इस शेर के साथ, कि चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफिर का नसीब, सोचते रहते हैं किस राह गुजर के हम हैं.

[00:03:50] इस शेर में नसीब का मतलब good luck या bad luck नहीं है, यहां नसीब का मतलब है वो चीज जो किसी के life का हिस्सा बन गई हो, मुसाफिर है तो भई चलना उसका नसीब है, student है तो भई पढ़ना आपका नसीब है, so that's literally what travelers do, they just keep doing what they have to do, they keep moving. सोचते रहते हैं किस राह गुजर के हम हैं, राह गुजर यानि रास्ता, यानि हम चल तो रहे हैं, लेकिन किस direction में चल रहे हैं और क्यों चल रहे हैं, यह है सवाद.

[00:04:20] सोचते रहते हैं किस रह गुजर के हम है honestly यह सिर्फ मुसाफिर की बात नहीं है यह हम सब की बात है school से college, college से job, job से promotion we keep ticking boxes because that's what life expects us to do लेकिन कभी-कभी रुख कर यह पूछना भी बड़ा जरूरी है that am I choosing this path or am I just walking on it just because everyone else is

[00:04:43] ऐसा लगता है कि निदा फाजली यहां नसीब को destiny से ज्यादा responsibility के दाएरे में रखके देख रहे हैं चलना शायद हमारे बस में ना हो लेकिन किस रास्ते पर चलना है उस सवाल से हम बच्च नहीं सकते हैं तो यह एक responsibility है जो सब पर है जलना है कि छलना है मसाफिर का नसीब सोछते रहते हैं किस राह गुजर के लिए यह गजल पूरी ही सुन लिजीए

[00:05:14] लिखते हैं अपनी मर्जी से कहां अपने सफर के हम है रुख हवाओं का जिधार का है उधर के हम है पहले हर चीज थी अपनी मगर अब लगता है अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम है वक्त के साथ है मिट्टी का सफर सदियों से किस को मालूम कहां के हैं किधर के हम है चलते रहते हैं के चलना है मुसाफिर का नसीब सोचते रहते हैं किस राह गुजर के हम है

[00:05:43] हम वहाँ हैं जहां कुछ भी नहीं रस्ता न दयार अपने ही खोए हुए शामो सहर के हम है गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम हर कलमकार के बे नाम खबर के हम है अब आगे बढ़ते हैं एहमत फरास के इस शेर के साथ लिखते हैं हम आ गए हैं तहे दाम तो नसीब अपना

[00:06:13] वगरना उसने तो फेंका था जाल वैसे ही तहे दाम यानि जाल के अंदर अब इसमें आप शायर का हूमर देखिए वो कह रहे हैं अगर मैं इश्क में गिरफतार हो गया हूँ तो ये मेरा नसीब है वरना उसने तो जाल मेरे लिए फेंका ही नहीं था यानि मैं उसकी महबबत में मुब्तला खुद हो गया हूँ मैं उसका टारगेट कभी था नहीं महबबत के लिए वो तो बस अपनी अदाओं में था अपनी जिंदगी में मसरूफ था

[00:06:41] जो मुसकुराहत मुझे खास लगी ऐसा लगा कि शायद मेरे लिए एक्स्क्लूसिव है पता लगा बाद में उसमें एक्स्क्लूसिविटी तो कुछ थी ही नहीं और मुझे ऐसा लगता है

[00:07:09] उर्दू-नामा जो लास्ट अपिसोड था फरेब पर था नहीं सुना तो सुने जिए उससे भी पहला एपिसोड था अगा के उपर वो भी नहीं सुना तो सुने जीए घगा फरेब और अब नसीब फराज के शियर पर फिर से आते हैं हम हागये हैं तहे दाम तनसीब अपना वगरना उसने तो फेंका था जाल वैसे ही। आगे इस घजल का एक और शेर आप सुनिए।

[00:07:35] मैं रोकना ही नहीं चाहता था वार उसका। गिरी नहीं मेरे हाथों से ढ़ाल वैसे ही। इस शेर को समझने के लिए उर्दू शायरी का एक कॉमन ट्रोप यहां पे आपको समझना जरूरी है। इश्क को अक्सर एक जंग की तरह इमाजन किया जाता है। लेकिन यहां वार और धाल लिटरल नहीं हैं।

[00:07:58] अब इस अच्छा जाल और धाल नहीं हैं। अब इस ट्रोप के अंदर भी दो अलग आर्क होते हैं। पहला आर्क होता है falling in love. यहां जीत और हार का मतलब relationship का successful या unsuccessful होना नहीं है। जो पहला आर्क है।

[00:08:25] यह falling in love वाला, शुरुवात वाला है stage. यहां हार का मतलब सिर्फ इतना है कि किसने सबसे पहले अपनी emotional guard नीचे रखी। किसने सबसे पहले, किसने सबसे पहले अपना दिल खो दिया। यानि उस सारी flirting के आगे किसने अपने गुटने टेक दिये हैं। पहला आर्क यह है। दूसरा आर्क बाद में आता है जब relationship शुरू होता है, वहां जीत और हार के माइने बदल जाते हैं।

[00:08:50] किसको वफा मिली, किसको दगा मिली, किसका इंतजार रंग लाया, किसका दिल तूटा वगएरा वगएरा। फरास का यह शेर पहले आर्क का है। अब दुबारा यह शेर सुनेंगे।

[00:09:44] यह शेर आप सुनिये। आपको धुन भी याद है, इसकी बेगम अख्तर के आइकानिक खजल। आप कहते थे के रोने से ना बदलेंगे नसीब, उम्र भराप की इस बात ने रोने ना दिया।

[00:10:14] पहला मिस्रा सुनकर लगता है कि यह बस एक फ्राक्टिकल सी बात है, रोने से नसीब थोड़ी बदलता है, विच इस ट्रू, बात भी सही है बिलकुल, लेकिन दूसरा मिस्रा पूरा शेर पलट देता है, उम्र भराप की इस बात ने रोने ना दिया। फ्रस्ट्रेशन भी है इसमें, हल्पलेसनेस भी है इसमें, यह नहीं शायर ने इस बात को इतनी संजीदगी से ले लिया कि खुद को कभी रोने नहीं नहीं दिया, जैसे आंसु बेकार हैं क्योंकि इन से आउटकम तो वैसे भी नहीं बदलेगा, तो रोने का फायदा?

[00:10:39] लेकिन रोना कब सिर्फ नसीब बदलने के लिये होता है? कभी कभी, हम इसलिए रोते हैं क्योंकि दिल को उस दुख से गुजरना होता है, because the grief that you're going through, it needs an outlet.

[00:10:51] तो जैसे शायर है, वो इस बात की तरफ इशारा कर रहे हैं कि नसीब शायद वाकर ना बदले, लेकिन अपने emotions को दवा देने से भी कुछ नहीं बदलता है, बस दर्द अंदर ही अंदर रह जाता है, और तिर वो किसी दूसरी शकल में बहर निकलाता है, कभी घुस्से की श

[00:11:20] अकसद तसली देना था, वही उम्र भर के लिए एक emotional rule बन गया है, वही पूरी उम्र के लिए अपने आप में suffering बन गया है, वैसे तो नहीं होना चाहिए, तो नसीब पे आज का एपिसोर यहीं पे खत्म करते हैं, अगले हफते फिर से आप से मिलते हैं, खयाल रखिए, खु अजया हाफिज