इन्द्र का पद पाने के बाद नहुष का मन घमंड से भर गया और वो ऋषि मुनियों को अपमानित करने लगा। यहाँ तक की उसने इंद्राणी शची के साथ विवाह करने का हठ ठान लिया।
शची ने उसके विवाह प्रस्ताव को स्वीकार करने का नाटक करते हुए एक शर्त रखी की देवराज नहुष ऋषियों द्वारा उठाई पालकी में बैठकर विवाह के लिए आयें।
मद में चूर नहुष ने शची की शर्त मान ली। जब ऋषिगण नहुष की पालकी लेकर चल रहे थे तो वो उनसे बार-बार “सर्प, सर्प” कहकर जल्दी चलने को कहने लगा।
उसके इस व्यवहार पर ऋषि अगस्त्य ने क्रोधित होकर उसे एक विशाल सर्प बनकर पृथ्वी लोक पर चिरकाल तक रहने का श्राप दे दिया। इस प्रकार नहुष के पतन के बाद ऋषियों ने इन्द्र को पुनः उनके सिंहासन पर स्थापित कर दिया।
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