Firaq Gorakhpuri was born on 28 August 1896 as Raghupati Sahaay Firaq. On his birth anniversary, we return to a poet who changed how love could be written about in Urdu.
Firaq writes of ishq, but also of what accompanies it: desire, qurbat, longing, loneliness, memory and dard. What sets him apart is the attention he pays to these emotions. He doesn’t just describe them; he looks closely at what they do to us.
In this episode, we follow some of his best-known verses and his deeply personal nazm “Jugnu” to grasp a sense of Firaq’s world, his life and the many shades of love that run through his poetry.
Perhaps, along the way, we will better understand how he revolutionized Urdu poetry by blending classical Urdu romance with modern psychology and Eastern philosophy.
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[00:00:36] आज का पॉड़कास शुरू कर रही हूँ फिराक गोरखपुरी के ग्रुबाई के साथ, क्योंकि इसमें रक्षा बंधन की सुभा का सीन पेंट कर रहे हैं, के रक्षा बंधन की सुभ रसकी पुतली च्छाई है घटा गगन पे हलकी हलकी, बिजिली की तरहां लचक रहे हैं,
[00:00:53] लच्छे भाई के है बांधी चमकती राखी, सुभा का मन्जर है, रक्षा बंधन है, आस्मान पर हलकी घटा, राखी के लच्छे बिजिली की तरहां चमक रहे हैं, और एक बेहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांध रही है, दे क्विन पर शुरू हो गया है उर्दु �
[00:01:14] विजश्न आमा मेरा नाम है फबेहा सयेद, आج बात होगी सिर्फ और सिर्फ फिराख गोरखपुरी की, जिनका असली नाम फिराख नहीं था, फिराख गोरखपुरी का असली नाम रगhouपती सहाई फिराख था, फिराख उनका तखलस था, यानि पोइट का अडॉप्टेड लि
[00:01:43] जुदाई, सेपरेशन, फुरकत और यह जो फुरकत वर्ड है इस पर तो पूरा एपिसोड आपको हमने एक बारी सुनाया भी है तो अगर आप स्पॉटिफाइ, गूगल पॉडकास्ट जैसे प्लाटफॉर्म्स पर उर्दुनामा अगर सुनते हैं तो पिछले तमाम एपिसोड आपको यहां मिल सकते हैं खैर हम बात कर रहे हैं फिराख गुरकपुरी की 1896 में गुरकपुर में पैदा हुए फिराख सिर्फ शायर नहीं थे वो क्रिटिक भी थे, स्कॉलर भी थे और इंग्लिश लिटरिचर के टीचर भी थे
[00:02:10] अलाहबाद युनिवरसिटी में इंग्लिश पढ़ाते थे और इसी दोरान उर्दू में शायरी भी लिखते थे और जो उनकी किताब है गुले नखमा उसके लिए उन्हें ग्यान पीठ अवार्ट से नवाजा भी गया था फिराख को हम अकसर इश्क और रोमैंस का शायर मानते हैं लेकिन ये कहना कि उनकी शायरी में सिर्फ इश्क, लॉंगिंग, लोनलीनेस और दर्द है ये गलत होगा वो इसलिए क्योंकि भाई उर्दू की रोमैंटिक पोईटरी में ये तो बहुत ही कॉमन और पुराने थीम्स है
[00:02:39] तो फिराख के खासियत सिर्फ इन थीम्स को एक्सप्लोर करने में क्या हुई? वैल, उनके खासियत ये है कि वो इन एमोशिंस को सिर्फ एक्सप्रेस नहीं करतें उपर उपर से लिखनी देतें हैं इश्क उनके लिए सिर्फ एक जज़बा नहीं रहता है वो उस एक्सप्रियन्स को अंपाक करते हैं डिजायर क्या है, जुदाई हमारे अंदर क्या करती है, किसी को चाहना हमें कैसे तबदील करता है, कैसे बदलता है,
[00:03:07] फिराख इन सवालों को शायरी के अंदर लेकर आ जाते हैं. और साथ ही उनकी जो शायरी है बहुत sensual भी है. Body, touch, beauty, desire, इस सब को romantic experience का बिलकुल natural हिस्सा समझते हैं. तो आज कुछ अशार शामिल किये हैं उनके, जिनके जरीए कोशिश है कि हम फिराख को थोड़ा सा समझ ले, उनके थोड़े नस्दीक आ जाएं.
[00:03:32] तो शुरुआत करेंगे उस शेर के साथ जो फरहान अख्तर ने हमको सिखाया था. जिन्दगी ना मिलेगी दोबारा में. के शाम भी थी धुआ धुआ धुआ, हुसन भी था उदास उदास, दिल को कई कहानिया याद सिया कर रह गएं.
[00:04:00] शाम भी थी धुआ धुआ धुआ, शाम में एक हेज है, एवरिटिंग इस लिटल बलर्ड, थोड़ा इन्दिस्टिंक्ट और फिर शायर लिखता है के हुसन भी था उदास उदास. यानि जो ब्यूटी बाहर है वो भी उदासी के रंग में रंगी हुई है. प्रॉबबली यहां कहा जा सकता है के जैसा वो अंदर फिल कर रहे हैं, उसी एमोशन को, उसी फीलिंग के चश्मे से उन्हें बाहर की दुनिया दिखाए दे रही है.
[00:04:40] दिल को कई कहानिया याद सिया के रह गई. एक शाम है, एक पर्टिक्यूलर आट्मस्फियर और सड़नली दिल में गुजरी हुई जिंदगी की कहानिया उभरने लगती है. Not one particular memory, बट कई कहानिया और याद सिया के रह गई. Now this is important. वो कहानिया पूरी तरह याद नहीं आई हैं, ट्रिगर हो गई है बस. जैसे उनकी एक जहलक आई है, कुछ uneasy सा feel हुआ है या बहुत या अच्छा सा feel हुआ है. And then they linger.
[00:05:07] So हमें ये पता नहीं कि वो memories pleasant हैं या painful हैं. बस इतना जानते हैं कि उस उदास, खुबसूरत शाम ने शायर को अपनी गुजरी हुई जिंदगी की तरफ मोड दिया है. And suddenly so many old stories come back to him. Or perhaps they almost come back. यात सी आगे रह गई. अब आप ये शेर सुनिये फिराख का, जिसमें वो बात कर रहे हैं उस crisis की, जो हम महसूस करते हैं,
[00:05:37] After achieving something, जिसे हम कब से हासल करना चाह रहे होते हैं, लिखते हैं, तुम मुखातिब भी हो, करीब भी हो. तुम को देखें कि तुम से बात करें. मुखातिब यानि जिससे आप डायरेक्ली खिताब कर रहे हैं. खिताब. किताब नहीं. खिताब. यानि address. तो फिराख कह रहे हैं, तुम मेरे सामने हो,
[00:06:05] मुझसे डायरेक्ली बात कर रहे हो, और करीब भी हो, बिलकुल पास हो. यानि जिस शक्स के करीब आने की तमना थी, वो अब actually सामने बठा है. सिर्फ पास ही नहीं है. There is an exchange happening. तुम मुखातिब भाई मुझसे. तुम उचसे बात कर रहे हो. जिसके खुब मेरे कब से बुन रहा था, वो finally moment आ गए, वो हो रहा है. और फिर अचानक वो crisis हो जाता है. कि तुम को देखें, कि तुम से बात करें. There is something very human about this.
[00:06:35] कभी किसी चीज को इतना किसी के बारे में longing करते रहते हैं, उसके लिए तना wait करते हैं, endure करते हैं, और जब वो finally मिल जाती है, तो एक पल के लिए समझ नहीं आता कि क्या करें, हम बॉकला जाते हैं. अब इस moment के साथ क्या करें? Now what next? फिराख इसी hesitation को पकड़ लेते हैं, और शायद ये जो hesitation है, इसलिए है क्योंकि जिस चीज का इनतिजार था, उसके हासल हो जाने पर,
[00:07:03] यकीन नहीं हो पा रहा कि ये वाकई हो रहा है कि नहीं. तुम मुखातिब भी हो, करीब भी हो, तुम को देखें कि तुम से बात करें. यानि पहले देखने दो, दिल ठहरने दो, यकीन आ जाने दो, जब थोड़ा संभल जाएंगे, तब हम बात करने की
[00:07:37] आपको सुना रही हूँ. ये सारे आइकानिक अशार हैं उनके वाइद वे. मुख जबानी सब को याद हैं. ये वाला तो कई बार मैंने इस्तिमाल किया है पॉड़कास्ट में. कि बहुत पहले से उन قدموں की आहट जान लेते हैं, तुझे ऐजिन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं. यहां जिन्दगी को फिराक एक परसन बना देते हैं, एक इनसान बना देते हैं. जैसे कोई शख्स दूर से आ रहा हूँ,
[00:08:06] चहरा दिखाई ने दिया है, कदमों की आहट ही सुन ली है, उसी से पहचान कर ली है, कि यह कौन है, भई यह जिन्दगी है. तो यह जो शेर है, इसको आप दो तरहां से पढ़ सकते हैं. एक तरीखा तो यह है, कि भई अगर इस परसनिफिकेशन को महभूब के तोर पे हम पढ़ें, तो जिन्दगी और महभूब एक दूसरे में मर्ज हो जाते हैं, यानि महभूब जिन्दगी का सिंबल है, जिन्दगी महभूब का, जैसे महभूब का आना ही जिन्दगी का आना हो. दूसरा तरीखा क्या है यह शेर पढ़ने का?
[00:08:36] और ज्यादा अबस्ट्राक रीडिंग यह है इसकी, जो मैं बतारी हूँ, कि फिराख जिन्दगी के पाटर्ण्स को पहचानने की बात कर रहें यहां. एक तवील एक्सपिरिंस के बात, हम चीजों के सामने आने से पहले ही उनकी आहट पहचान लेते हैं. हम पहले से ही प्रिडिक्ट कर देते हैं कि ऐसा हुआ है, तो अब ऐसा होने वाला है. जिन्दगी की मुश्किलात, उसकी डिमांड्स, उसके फेमिलियर पाटर्न्स और उनके कॉंसिक्वेंस्स, इन सब के कुछ साइन्स होते हैं. तो इतने वाकिफ हो जाते हैं इन सब चीजों से,
[00:09:05] कि आल्मोस्ट प्रिडिक्ट कर सकते हैं कि अब क्या होने वाला है. मिसाल के तौर पे बहुती लेम एक्जाम्पल है, ये कि जैसे ओफिस में मैनेजर आप से कहा है, कि बस एक छोटा सा प्रोजेक्ट है, दो दिन का काम है, डीटेल्स मालूम नहीं आपको, लेकिन माथा ठनक गया है, कि अच्छा, दो दिन का प्रोजेक्ट है, तो महीना तो आराम से खीजेगा, ओवर टाइम भी करना पड़ जाएगा, बहाने बाजी की भी एक आहट होती है, जो पहले से पता चल जाती है, अगर आपने experience कर रखा है वसा आदमी के साथ, कोई आदमी आपसे कहा है, भाई, बस एक घंटे में आ रहूं है,
[00:09:35] निकल जाओंगो एक घंटे के बाद, तो experience आपका, इतना पक्का हो जाता है इस आदमी के साथ, कि आपको मालूम है, अगर वो कहता है एक घंटा, इसका मतलब है तीन-चार घंटे के बाद आएगा, तो यहाँ फिराख तजर्बे से आने वाली, उस expertise की बात कर रहे हैं, जहाँ वक्त के साथ इंसान, situations के unfold होने से पहले ही, समझ जाता है कि क्या होने वाल है, तो दूर से पहचान लेना, इसी hard-earned understanding की image है, you know, what's coming before it actually arrives,
[00:10:04] और इसमें सिर्फ wisdom नहीं है, थोड़ी सी exhaustion है, you know, I know what's going to happen, जिंदगी हर बार surprise नहीं करती है, हलके फुल की जो signs होते हैं, किसी घटना के घटने के, वो बहुत पहले से दिखने लग जाते हैं, और इनसान समझ लेता है, अब इश्क के हम बात कर रहे हैं, फिराग गोरकपुरी के अपनी खुद की brand उन्होंने बनाई है,
[00:10:32] इश्क को इतने खुबसूर्ती से और इतने humanize करके समझाने की कोशिश की है अपने काम से, कि कोई समझे तो एक बात कहूं, कोई समझे तो एक बात कहूं, इश्क तौफीग है, गुनाह नहीं, तौफीग का मतलब ability, opportunity, या जब आपको कुछ करनी के लिए, कोई enable कर दे, especially for something that is considered good or worthy,
[00:11:04] इसको थोड़ा everyday life में अगर देखें, तो जो काम हम normally मुश्किल समझते हैं, पढ़ाई, महनद, discipline, उनको कर पाना भी एक तौफीग हो सकती है, शादी, companionship, खुशी, तौफीग है, बच्चों का हो जाना, जो आपको ठकावी देते हैं, जिनके वारे में हम कहते हैं, parenting is hardship after hardship, उनके साथ रहना, उन्हें पालना, पोस्टना, उस hardship को एंडियॉर कर पाना भी तौफीग हो सकती है, तो शायर कहता है कि इश्क का रास्ता आसान हो,
[00:11:33] ये जरूरी नहीं, it can be tiring, challenging, demanding, even painful, लेकिन उसकी direction, खैर की तरफ है, positive है, रास्ता मुश्किल हो सकता है, लेकिन इश्क खुद, गुना नहीं है, blessing है, तौफीग है, अब फिराग गुरगपुरी का, आपको एक quote, एक line उनकी कहीं हमने पड़ी है कि, जिन्दगी के खारजी मसाइल कहल, शायरी नहीं,
[00:12:03] so this thought is about poetry, उनका thought है, शायरी के बारे में, angle है ये शायरी को समझने के लिए, कि हमारी जिन्दगियों में, इसकी क्या एहमियत होनी चाहिए, फिराग कहते हैं, जिन्दगी के खारजी मसाइल कहल, शायरी नहीं है, लेकिन वो दाखिली मसाइल कहल जरूर है, फिर से बढ़ती हूँ, जिन्दगी के खारजी मसाइल कहल शायरी नहीं,
[00:12:33] लेकिन वो दाखिली मसाइल कहल जरूर है, दो वर्ड्स हैं यहापे important, खारजी, दाखिली, फिराख का ये जुमला बहुत ही ज्यादा लेयर्ड है यहाँ पे दो मुवमेंट्स की बात हो रही है खारजी और दाखिली खारज जो चीज बाहर होती है बाहरी होती है उसे खारजी कहते हैं खारज बाहर यानि एक्सटरनल जैसे मिनिस्ट्री आफ एक्सटरनल अफैस को उर्दू में क्या कहते हैं विजारते खारजा
[00:13:03] और खारज आमबोल चाल में भी इस्तिमाल हम कर लेते हैं जैसे के खारज करना आप को हैं कि मैंने उन्हें मशवरा दिया लेकिन उन्होंने तो पूरा सुना भी नहीं तो फिराः कहते हैं
[00:13:31] जिन्दगी के खारजी मसायल का हल शाइरी नहीं लेकिन वो दाखिली मसायल का हल जरूर है यानि जो प्रॉबलम्ज हमारे बाहर हैं और अइक्स्टरनल सरक्मस्टांसिस शाइरी उनको सौल्ट नहीं कर सकती आपको जौल नहीं दे सकती
[00:13:58] लेकिन जो कुछ उस वाकिय के बाद आपके अंदर होता है जो disturbance होती है हलचल आप महसूस करते हैं दर्द, तनहाई, longing, शायरी वहां तक पहुँच सकती है वहां दाखिल हो सकती है And maybe इसलिए फिराक ने दाखिली कहा Internal नहीं कहा है उन्होंने दाखिली जो अंदर दाखिल हो जाए So there's a movement here उन्होंने दाखिल का इस्तेमाल किया है दाखिली का है Because poetry takes us inward
[00:14:28] वाकिया बाहर होता है उसका जो impact है वो अंदर होता है उसका तजर्बा अंदर आप महसूस करते हैं पिसाल के तौर पे कोई आपको छोड़के चला जाए ये एक external event है लेकिन फिर सवाल आता है कि मैं इतना hurt क्यों हूँ मैं actually miss क्या कर रहा हूँ या तकलीफ मुझे क्यों हो रही है यहाँ poetry हमें experience के अंदर ले जाती है कभी एक share वो feeling कह देता है जिसका नाम हमें शायद पता भी नहीं था तो इसलिए situation नहीं बदलती है
[00:14:56] और यहाँ पे जो फिराख का हल है के शाइरी जो है वो दाखिली मसाइल का हल जरूर है खारिजी मसाइल का नहीं है यहाँ पे हल का मतलब यही है पेन का खतम होना नहीं है बलके उसके अंदर दाखिल होकर उससे समझवाना है जो पोईटरी नेसेसेरिली वो सॉल्व नहीं कर सकती जो तुमारे बाहर हो रहा है लेकिन वो तुम्हें अंदर आकर चीजें फिक्स कर सकती है जिन्दगी के खारजी मसाइल का हल शायरी नहीं है
[00:15:25] लेकिन वो दाखिली मसाइल का हल जरूर है अब आते हैं आखरी हिस्से पर और यह आखरी हिस्सा थोड़ा तवील है यहां आपको एक मास्टर पीस है फिराग गोरगपुरी का जो पूरा तो पढ़ नहीं सकती क्योंकि बहुत लंबा टेक्स्ट है इसका एक हिस्सा पढ़ूंगी आच्छली दो हिस्से पढ़ूंगी मैं इस नजम का नाम है जुगनू
[00:15:54] फिराग गोरगपुरी के अपने परसनल लॉस से निकली हुई यह नजम है उनकी मा उनके पैदा होने के दिन ही गुजर गई थी यह नजम जब शुरू होती है तो इसमें मौनसून का बरसाथ का एक सीन पेंट करते हैं फिराग के घटा है बारिश, हवा, पेड अंधेरे में चमकते हुई हजारों जुगनू हैं लेकिन इसी मन्जर से फिराग
[00:16:23] अपने बच्पन और मा की कमी की तरफ चल पड़ते हैं बच्पन में उन्हें घर की औरते बताती थी के जो जुगनू है न ये भटकती हुई रूहों को रास्ता दिखाते हैं एक छोटे बच्चे के लिए तो बात सच हो सकती थी न तो वो सोचते थे काश मैं भी एक जुगनू होता तो अपनी मा की भटकती हुई रूह को रास्ता दिखा कर घर ले आता उस मा को जिसको इन्होंने कभी नहीं देखा अब इस नजम में वो सारे एक्सपीरियंस गिनवा रही हैं
[00:16:50] जो इन्होंने कभी महसूस ही नहीं किये और फिर इस नजम में एक बच्चे का भी गम है जिसने मा को कभी नहीं देखा और एक मा का भी गम है जिसने अपनी गोद में अपने बच्चे को कभी लिया ही नहीं अपने हाथ से कभी खाना ही नहीं खिलाया तो यह जो grief है ना सिर्फ मा को खो देने का नहीं है, यह grief है for a relationship that never got the chance to exist and that's so painful. This Nazam is really heartbreaking.
[00:17:18] जुगनू नजम में सिर्फ nature के elements ही नहीं है, they become a part of a child's imagination. यह सोच के आप यह, Nazam आप सुनिये. तो नजम शुरू होती है और बीच में जो हिस्सा है जो मैं पढ़ रही हूँ वो यह है कि बतूने शाम में इन जिन्दा कुमकुमों की दमक, he is talking about जुगनू.
[00:17:43] बतूने शाम में इन जिन्दा कुमकुमों की दमक, किसी की सोई हुई याद को जगाती थी. वो बेपनाह घटा, वो भरी-भरी बरसात, वो सीन देख के आँखे मेरी भराती थी. मेरी हयात ने देखी हैं बीस बरसाते, मेरे जनम ही के दिन मर गई थी मा मेरी.
[00:18:14] मुझे खिलाईयों और दाईयों ने पाला था वो मुझसे कहती थी जब घिर के आती थी बरसाद, जब आस्मा में हर सूंख खटाएं चाती थी, बवक्त शाम जब उड़ते थे हर तरफ जुगनू दिये दिखाते हैं ये भूली भटकी रूहों को मजा भी आता था मुझको कुछ उनकी बातों में, मैं उनकी बातों में रह रहके खोबी जाता था, पर इसके साथ ही दिल में कसक सी होती थी, कभी कभी ये कसक हूक बन के उड़ती थी
[00:18:41] यतीम दिल को मेरे ये खयाल होता था, ये शाम मुझको बना देती काश एक जुगनू, तो मा की भटकी हुई रूह को ही दिखाता रह, कहां कहां वो बेचारी भटक रही होगी, ये सोचकर मेरी हालत अजीब हो जाती पलक की ओट में जुगनू चमकने लगते थे, कभी कभी तो मेरी हिचकिया सी बन जाती कि मा के पास किसी तरह मैं पहुच जाऊं और उसको रहा दिखाता हुआ मैं घर लाऊं
[00:19:08] दिखाऊं अपनी खिलोने, दिखाऊं अपनी किताब, कहूँ के पढ़के सुना तू मेरी किताब मुझे फिर इसके बाद दिखाऊं उसे मैं वो कौपी कि टेड़ी मेडी लकीरें बनी थी कुछ जिसमें ये हर्फ थे जिन्हें मैंने लिखा था पहली पहल दिखाऊं फिर उसको आंगन में वो गुलाब की बेल, सुना है जिसको उसी ने कभी लगाया था
[00:19:38] फिर आगे का एक और हिस्सा है जब लिखते हैं के ये देख कर मेरे दिल में यहूँ कुट्टी थी के मैं भी होता इन्ही जुगनूँ में एक जुगनू तो मा की भटकी हुई रूह को दिखाता राह वो मा मैं जिसकी महबबत के फूल चुनना सका वो मा मैं जिससे महबबत के बोल सुनना सका वो मा की भेंच के जिसको कभी मैं सोना सका मैं जिसके आचलों में मुँ छुपा के रोना सका
[00:20:04] वो मा की घुटनों से जिसके कभी लिपटना सका, वो मा की सीने से जिसके कभी चिमटना सका, हुमक के गोद में जिसकी कभी मैं चड़ना सका, मैं जेर साया यूमीद जिसके बढ़ना सका, वो मा मैं जिससे शरारत की दाद पाना सका, मैं जिसके हाथों महबबत की मार खाना सका समारा जिसने ना मेरे जुंडेले बालों को बसा सकी न जो हूटों से सूने गालों को
[00:20:33] जो मेरी आखों में आखें कभी न डाल सकी न अपने हाथों से मुझको कभी उच्छाल सकी वो मा जो कोई कहानी मुझे सुना न सकी
[00:21:07] बचा के रखना सकी, वो मा जो मेरे लिए तितलियां पकरना सकी,
[00:21:22] जो भागते हुए बाजू मेरे जकर ना सकी, जो मुँ बना के किसी दिन न मुझ से रूट सकी, जो ये भी कहना सकी, जा न बोलूँगी तुझसे, जो एक बार खफा भी न हो सकी मुझ से, वो जिसको जूठा लगा मुँ कभी दिखाना सका, जो मिट्टी खाने पे मुझ को क�
[00:21:51] कहसकी घामर, शरार्तों से मेरी जो कभी उलचना सकी, हिमाकतों का मेरी फलसफा समझ ना सकी, वु माँ कभी जिसे चौकाने को मैं लुक comfort को मैं मैं लुक friend, जो में लुकिंए थेखाने को जिसकी आगे रुकना सका, जो अपने हाथ से बहरूप मेरे भर हमात को आँ lei करा सकी गले में डाली न बाहों के फूल माला भी न दिल में लौह जबीं से किया उजाला भी
[00:22:19] वो मा कभी जो मुझे बद्धियां पहना न सकी कभी मुझे नए कपड़ों से जो सजाना सकी वो मा न जिस से लड़कपन की जूट बोल सका न जिसके दिल पे दरां कुझीयों से खोल सका वो मा मैं पैसे भी जिसके कभी चुरा न सका सजा से बचने की जूटी गसम भी खाना सका
[00:22:49] वेरी ब्यूरिफूल वेरी हार्टब्रेकिंग और अच्छली जुगनू को यह जो नजम का हिस्सा भी पढ़ा है जी हाँ यह हिस्सा ही है क्योंकि जो असल टेक्स्ट है वो इससे भी ज्यादा तवील है जैसे मैंने बताया आपको तो इसे पढ़ने के बाद फिराक गोरखपुरी की जो शायरी है उसको एक और नजर से देखना मुमकिन हो जाता है एक ऐसा आदमी जिसने अपनी मा को जाना ही नहीं जिसने मेटरनल लव का एक्सपिरियंस नहीं किया है
[00:23:19] उसने उर्दु में महबत के इतने मुक्तलिफ रंग लिखे है कि अपने आप में वो एक इंस्टिटूशन बन गया है शायरी को समझने का एक स्कूल बन गया है फिराग गुरपुरी तो इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी शायरी को सिर्फ उनके परसनल लॉस से ही एक्स्प्लेइन किया जा सकता है लेकिन हाँ उनकी पोईट्री में लव को इश्क को जिस इंटेंसिटी और कॉम्टेक्सिटी के साथ observe किया गया है उस परसनल हिस्ट्री को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है and maybe
[00:23:48] इसलिए फिराग गुरपुरी के यहां इश्क सिर्फ एकी motion नहीं रहता है it becomes something to experience to examine and to put into words तो ये podcast था रघुपति सहाय फिराग के नाम अगले हफते मिलते हैं


