Bhagat Singh, Urdu and Revolution: Understanding His Multilingual World
UrdunamaSeptember 26, 202600:18:20

Bhagat Singh, Urdu and Revolution: Understanding His Multilingual World

Ahead of Bhagat Singh’s 119th birth anniversary, Urdunama explores a lesser-known aspect of the revolutionary’s intellectual life: his relationship with the Urdu language and literature.In this episode, Fabeha Syed speaks to Professor Chaman Lal, former Professor and Chairperson of the Centre of Indian Languages at JNU and honorary advisor to the Bhagat Singh Archives & Resource Centre. A scholar and author of over 50 books, Lal has spent years researching Bhagat Singh’s writings, reading and intellectual legacy.While Bhagat Singh did not write extensively in Urdu, the language was part of his early education and wider literary and political environment. From Urdu poetry and literature to the language of revolutionary politics, this conversation explores the place Urdu occupied in Bhagat Singh’s intellectual world. Learn more about your ad choices. Visit megaphone.fm/adchoices

Ahead of Bhagat Singh’s 119th birth anniversary, Urdunama explores a lesser-known aspect of the revolutionary’s intellectual life: his relationship with the Urdu language and literature.
In this episode, Fabeha Syed speaks to Professor Chaman Lal, former Professor and Chairperson of the Centre of Indian Languages at JNU and honorary advisor to the Bhagat Singh Archives & Resource Centre. A scholar and author of over 50 books, Lal has spent years researching Bhagat Singh’s writings, reading and intellectual legacy.
While Bhagat Singh did not write extensively in Urdu, the language was part of his early education and wider literary and political environment. From Urdu poetry and literature to the language of revolutionary politics, this conversation explores the place Urdu occupied in Bhagat Singh’s intellectual world.

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[00:00:35] The Quint पर शुरू हो गया है, Urdunama, मेरा नाम है वबेह सेयद, और आज हम बात करने वाले हैं भगत सिंख की, और उनके बारे में जिन से हम बात करेंगे, उनका तारूफ अभी थोड़ी देर में आपको देंगे, लेकिन पहले एक थौट आया है. लेकि भगत सिंख को हम अकसार �

[00:00:50] revolutionary के तोर पर याद करते हैं, लेकिन उनकी intellectual दुनिया में उर्दू का भी खास मकाम था, वो उर्दू पढ़ते थे, उर्दू में लिखते थे और उर्दू अखबार और अदब से काफी वाकिफ थे, उनके letters, writings और prison notes में उर्दू का असर बहुत दिखता है, और ये उनकी personality का

[00:01:08] एक ऐसा पहलू है, जो popular imagination में, शायद हम उतना discuss नहीं करते हैं, तो आज हम वो ही पहलू discuss करेंगे, भगत सिंग की उर्दू से ये दिल्चसपी आई कहां से, वो क्या पढ़ते थे, उर्दू में उनकी readings और writings कितनी गहरी थी, और क्या उर्दू ने, उनकी जो political और intellectual सोच है,

[00:01:29] उसको पुखता करने में कोई role play किया है के नहीं? इन सवालों पर बात करने के लिए हमारे साथ हैं प्रोफेसर चमलाल, हिंदी जबान के scholar और जवाहरलाल नहरू University के Center of Indian Languages के former chairperson.

[00:01:45] प्रोफेसर चमलाल ने अपने academic career का एक बड़ा हिस्सा, भगत सिंग की writings, उनके letters, prison notes, जितने भी उनकी documents हैं, उनको इखटा करने में लगाई है, उने preserve करने में और उने study करने में बिताई है.

[00:02:00] तो चमलाल सर की जो भगत सिंग पर scholarship है, उसका दाइरा काफी वसी है, उन्होंने दे भगत सिंग रीडर जैसे important collection को edit भी किया है, तो आज प्रोफेसर चमलाल के साथ हम बात करेंगे, भगत सिंग और उर्दू के उस रिष्टे पर, जो उनकी intellectual दुनिया को समझने के लिए ए

[00:02:30] फॉर्माटिव यर्ज में पढ़ते थे, इसकूल में पढ़ते थे, क्या होता था, उसके बारे में हमको कुछ पताईए. एक तो जब किसी भी शक्षियत के बारे में बात करें, तो उसके वक्त में जाके उसकी पहचान होती. तो बहगत सिंग का जो वक्त, जो निसाथ में उनकी पैदाइश और उसके बाद से स्कूल गएरा गए होंगे, तो पांच साल की उमर में गए होंगे.

[00:03:06] जे. पाने कुछ दार में स्कूलों को छोड़ दिये, कोई खालसा स्कूल हुआ या कोई हिंदू स्कूल हुआ नियुक्ट स्कूलु रगए हुआ। लेकिन सरकारी स्कूलों में य तमाम वाकी स्कूलों में जबान उर्दू थिए. उसका मतलब यह है क्गर माधरी जबान ती, यो प� ket seniorreet газ है लेकर शुरूओात उनकी किसीझ जबान को अगर काइडे से से हुए लिधा से उर्दु जवान Kung frost

[00:03:32] अनो rains सबस्कोल में जाते हैं आप सू कॉनल के जाते हैं तो जबान से शुरू होता है तो पुम्जाबी काकाएद उनों नहीं पड़ा, थेंगिलियंग आगरेजियंस, लेकिन उर्दु काकाएदOOOO लेकिन उर्थु का काएद। अपने दादा के नाम लिखे हुए या बाद में तो जो अपने पिता के नाम लिखते रहे हैं, वो सब उर्दू में.

[00:03:55] विच मेंज के उर्दू से तो उनकी एक तरीके से लिए चाहिए, कि एजूकेशन की ही शुरूआ था. उनके जो एजूकेशन का पहला प्राव था, वो उर्दू का था. इसलिए उर्दू उनकी जिंदगी में हमेशा बना रहा है. और इतना बना रहा है कि आखरी वक्त में जो उन्होंने खत लिखा, अपने छोड़े भाई, पुलतार सुनको, आखरी मेसेज उन्होंने लिखा, क

[00:04:23] वो तो उर्दू के शेर से ही इखा, हवा में रहे कि मेरे ख्याल की बिजली, यह तो जिंदगी कुरवान होने वाली चीज है, जिंदगी तो चले जाएगी, लेकिन रहेगा क्या, यह मुझते ख्या का था.

[00:04:52] आज तक हवा में उनके ख्याल की बिजली दोड़ रहे हैं. How beautiful. Sir, actually I've been wanting to ask you, कि Hindi के scholar हैं आप, उन documents को आपने कैसे पढ़ा जो उर्दू में लिखे हुए थे? क्या आप भी उर्दू पढ़ सकते हैं, जो इतनी आसानी से आपने वो documents पढ़के translate किये हैं? ने टेखे, उर्दू में उन्होंने जियादा नहीं लिखा. उनकी जो intellectual training है बाद में, शुरू का दौर उर्दू का था.

[00:05:20] लेकिन क्योंके वो अर्या समाजी थे तो संस्कृताइस्ड हिंदी का भी वो बहुत जोड था. वो मने पहले ही शुरू शुरू में चौती पांच में जमाद के बाद, वो तो अपने गाउन का चक नुबर 105 कहते हैं, लायलपर बंगे पुराने दमाने में कहा जाता था. आ

[00:05:50] जो फादर हैं, इस ददाए कि लिए जमाद से लेके आठी यह नौ जब तक वो आगे अपनी नेशनल कॉलज नहीं चले इंचेल एंचेल में पढ़े हुआ तो डिये वी स्कूल तो पूरी तरह से अरिया समझ्यो का स्कूल था और इसमें तो हिंधी और संस्क्रित पही सबस

[00:06:20] कि अपने दादाजी को लिखा है कि मैं ऐसे ऐसे पास हो गया हूं और ऐसे इस सब्यक्त मेरे इतने नंबर है, तो संस्कृत का भी उनने में चिए हुआ है, तो हिंधी उनकी इतने संस्कृताई है थिंदी थे एचाए बाद में जब उनके लेक अगरा जो है न मैं खुद हि

[00:06:42] जब आपने जो हो सकता है कि एक दुष्णर की जूरुत पर जाये, उनके कुछ अलफाज इतने संस्कृताई मुश्कल अलफाज में तो वो जो ज्यादा राइटिंग उनने की दो जबनों में की एक तो हिंदी में की और दूसरे अंग्रेजी में की एक तो माले जिए एक उ

[00:07:10] पंद्रा या बंटू कम जएदा वो पंजाबी और उर्दू में तो उर्दू में कुछ लेख उन्होंने जरूर लिखे तो कि मुझे जो उनका एक लेख है वो बंदे मातरम बंदे मातरम उर्दू का अखमार था जो लहोर से लाला लजपतरा निकालते थे लाला फिरोष्�

[00:07:32] एक यह णिप उनका पंजाब के हिंदूस्तान की अजाद़ी की तारीख में पंजाब का हिस्सा पुछ ऐसा ले कर वुछ अज़ उयएतूमें उन्हन फिंए उनुक्रा मि Marx निदिश थे लिखा है उनके कुछ ले इदे बहोर इतु है बहुँ कि ए और इसने a слon level two

[00:08:00] उन्हें शब्द जोर की गलती हैं, उन्हें स्पेलिंग्स एरर हैं, तो क्योंकि उनको पिंजाबी प्रॉपरली सीखे नहीं थे, ग्रामर तो सीखा नहीं थे, तो गुर्दवारे में जैसे पिंजाबी सीखे तो ऐसा है, लेकन बात में उन्होंने कृती मैगजीन में जब काम

[00:08:31] तो भाई संतोक सिंग अमेरिका से गदरी आये हुए थे, तो भाई संतोक सिंग निकालते थे पंजाबी में और मेरट से शायद उसका उर्दू एडिशन शाया होता थे, लगभग मिलते जुलते उसमें लेक होते थे, तो मुझे अपना अंदाजा है, पकार नहीं कह सकता न

[00:08:50] कि वो पंजाबी में भी खुद लिखते थे, और वही लेक उनका उर्दू में भी उनके ही हाथ से लिखा हुआ, तो यानि आप यह कह रहे हैं कि वो पहले पंजाबी में एक टेक्स्ट लिखते और फिर उसका तरजुमा उर्दू में करते, इस इट? अगर मालिजी उनको ख्रगणी नहीं हम थतने मस 모�birth करें, शी जदूति एक लोत पादे करें नहीं तितकी ड़ ενTF Insya Zachaniap

[00:09:20] दिन वह हम तो यहानि वे कि बात करें क Googla आ टेखने जो कही सारी ज़ानों में एक करें की जयॉत है।

[00:09:29] लेकिन उनको जबाने साख था बंगला और संस्कृत अपने अपने दोस्तों के नाम खत है उनोंने अपने एक खत में अपने दोस्त से उनोंने पर्षिन का काइदा बंगवाया था और उस वद शीख रहे थे असलमें उनको मौत का जब कुछ था ही नहीं ना

[00:09:58] घाँ जाती है कोई दिकट नहीं है मैं तो आखरी दम तक जो है भूँजे अपना अशी में आपने उसमे खेलात की बिजली में तो वो अफर्षिन से करे ने आखरी दौर बें क्या आजमी थी। तो मशूर किसा तो उनका यह है ना, मिस्टा नहीं आखीकत है वो कि जब लेने आये लिए तो हाथ में कुई किताब पढ़ एधी लेन कीुछ वगत के लिए उनको थोड़ा सा जटका सा लगा

[00:10:23] क्योंकि फांसी असल में उनकी 24 तारीख को सुब़े की फिक्स थी, 24 मार्च को जो कि दुनिया भर का एक कहना चायदा है कि सुब़े के वक्त फांसी दी जाती है, सारे मुलकों लेकिन उनको तेई शाम को फांसी दी गई

[00:10:53] लगाया था कि तुम इनके साथ रहो ताकि हमें मिलने का मुका मिलता रही अर उससे खुल के बात कर दे तो उस्वेक्ट को शैद अपने भूकरताले करकर के उनको अपने

[00:11:23] कर दुछ को रहे तो बाइसमर्ण को मिले तो उनका के बड़ लिया है अगर लिया हु तो अगर लिया उपने रहे तो उसे खुक तो थे को सुझेप लेताबे को किताब लेए तो किताब ले तो कीताब

[00:11:43] तो परानत में तश्री कोई बात ही नहीं किया उनोंने, जट से किताब खोलके उसको पढ़े लगे, परानत में तक उस पूछते रहे तो हुआ करते रहे, हाँ ठीक कर ले ले ले लो कर ले ले अपने पूरा ध्यान जो है किताब में लग रहा है, अब उनके दिमाग में क्या �

[00:11:58] किताब मिली है और चौवीज की सुभ़ए फांसी होगी, तो मैं सारी दिन में की किताब पढ़ दूगा, और रात को सोने की जरूरत भी क्या है कर किताब पढ़नी है तो फांसी तो चड़ने हैं सुआ तो इस तरीके से मैंने जब वो चार बजे के करीब जो जेल का एक वार

[00:12:26] तो चतर सिंग आया और उसने अच्छा समझ गए वो उने जाना तो सुभए था लेकर लगता ही अभी तो उने खाँ ठीक है कोई बात ने रुको एक इनकलबी दूसरे इंकलबी से मिल रहा है तो उने किताब का पनाव पढ़ते रह और अपना पनाव ख़तम कर के किताब का �

[00:12:46] पर उने खाँ ठीक है चलो अब चलते हैं तो उसके बाद से उसके साथ अपना नारे बारे लगाते हुए इंकलब जंदाबाद उदर से सुखदेवर राजगुरू तो मैंने पूरे जेल में इनके नारों की गून पढ़ गई और सारे कहदी एकदम कहदी को तो बंद किया ह

[00:13:06] तो अब जेल कंदर तो चिडिया भी फटकने ने दे एक यह तो खुद पराना मैता ने अपने मेमायर में लिखा है उसा उन्हों ने आप लिखे हैं अब यह जो पॉंट है सर मैसी पे आप से सवाल और मजीद बात करना चाहती हूं कि यह जो जो लोगन है इनकलाब जंदा�

[00:13:43] जो जो जो जो जो जो जो जो जो एक उन्हों इसानदर जो जो जो गन दिया यह उनी सो इकी स्की कांगरस में दिया

[00:14:13] Game तो मने ऐसा तो ऐसी शक्षिएत तो हिंदुस्तान में मिली बहुत ही कहना चाहिए के रेख चीज है तो हुआ ये के मौलाना हसरत मुहानी ने निजी सो इक की कॉंग्रस में कहा गानी जी से कहा हुए

[00:14:30] कि देखो मैं इस कॉंग्रस में ये रिजूशन पेश करने जा रहा हूं कि हमारे मुल्क को पूरी आजादी चाहिए जो तो बात चलती थी तो पूरी आजादी की बहुत बात में आई बहुत लंबे अर्से तक तो कॉंग्रस की मुवम्मेंट वो बहुत चोटी-चोटी चीज

[00:14:55] तो गंदी जी ने कहा कि भाई ये तो बहुत मुश्किल तुम खड़ी करोगा अरे लिए क्योंकि पूरी आजादी की तो हम सोच में ने सकते जबीन पर को तयारी ने होगा इसके लिए तो मौलाना हसृत महाने ने वो रेजूशन पेश किया पूरी आजादी की लेकिन उसक

[00:15:23] करें का इसारे बड़े लिटाओने ये का कि देखिये भई अभी इसका वक्त नहीं आया रहा है इसलिए हम इतनी बड़ी मांग इसमें नहीं कर सेथे तो उस सेशन में मौलाना रासरत महानी ने ये नारा भी वही पे लगा इंकलाब जिंदाबाद बहुत लंबे अर्से तक

[00:15:38] लोग यही सोचते रहें समझते रहें ये नारा भागत सिंग का है थोड़ा शोचल मेडिया हुआ कि अपाइदा हुआ कि कम से कम इसकी बार में एकीकत पता चल गई तो अगर हम ये का हैं किसी उर्दू पोईट का इंफ्लूएंस था भागत सिंग पर तो क्या ये सच होगा

[00:16:00] और अगर है तो फिर कौन से वो नाम है जो आपको लगता है कि भागत सिंग के उपर उत्लू शाहरी का असर था लेकिन लालचंद फलक कुंदनों वो उनके बहुत पसंदिन दशार में थे लालचंद फलक जो है वो असलमें ये महप़ाने वतन नाम से उनकी एक तंजीम थी

[00:16:21] उसी को हिंदी में भारत माता स्वाइटी काया जाता था ये तंजीम बनाई हुई थी अजीद सिंग उनके छोड़े भाई अपना स्वरन सिंग जो तेश साल के उर्भे ही शेहीद एक तरिके से कहना चाहिए जेल के जुदम कर शेहीद हो थी छोड़े चाचा बही सिंग के �

[00:16:39] इन सब की तंजीम थी है महभाने वतन और उस पे उर्दू में सब कुछ निकलता हुआ था असलिया बहत बहत बहत बहत बहुत बहुत थे हैं लाचंद फलक भी में धर थी लेकर लाचंद फलक के शेर वो अक सर गात भी थे उनके चिछए उसका बहुत्यान थे जिकर में उस

[00:17:09] अज़ने उर्दू जबान एक ऐसी ज़ान है।

[00:17:39] एक खास किसम थी जो के शमाले हिस्सों के लोगों की तो रहती है। तो उसमें भगत संगी थी। बहुत ही ज्यादा इंट्रिस्टिंग एपिसोड रहा था है। अगले हफते मिलते हैं। अगले हाफज झाले हैं। झाले हाफज जबादा ने जो आप्रावश रहा दियात लुट एक तो रहा है।