वरदविनायक –महड़

वरदविनायक –महड़

कोल्हापुर जिले के महड़ में स्थित वरदविनायक मंदिर को अष्टविनायकों में चतुर्थ माना जाता है। वरदविनायक, गणेश जी का वर प्रदान करने वाला स्वरूप है जिनका नियमानुसार व्रत करने से सम्पूर्ण मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है। प्रति माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मध्यान्ह के समय वरदविनायक चतुर्थी या वैनायकी चतुर्थी का व्रत किया जाता है। पौराणिक मायताओं के अनुसार कौंडिन्य राज्य के राजकुमार रुक्मणगड़ एक बार वन में शिकार करते समय विश्राम करने हेतु ऋषि वचकनवी के आश्रम पहुंचे। रुक्मणगड़ के सौन्दर्य को देख ऋषि की पत्नी मुकुंदा को उनसे प्रेम हो गया और वह राजकुमार से शारीरिक संबध बनाने की इच्छा प्रकट करने लगी। परन्तु सदाचारी रुक्मणगड़ने इस बात को अवैध मानते हुए उन्हें मना कर दिया। उसी समय इस बात से दुखी मुकुंदा को देख कर देवराज इन्द्र के मन में उनके प्रति काम भावना जाग्रत हुई और उन्होंने रुक्मणगड़ से वेश में आकर मुकुंदा के साथ संबंध बनाए। कुछ दिनों के उपरांत इन्द्र के औरस से मुकुंदा ने गृतसंबद नामक एक पुत्र को जन्म दिया। बड़े होने के बाद जब गृतसंबद को इस बात का पता चला की वह एक अवैध संतान है, उसका हृदय दुख से फट पड़ा और अपनी माता को कोसते हुए आश्रम से निकल गया। वह दिन रात अपने भाग्य की निंदा करते हुए वन में भटकने लगा। अंत में थक हार कर गृतसंबद ने अपने मन को शांत करने हेतु भगवान् गणेश की स्तुति करनी शुरू कर दी। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् गणेश ने उसे दर्शन दिया और उसके संतापित हृदय को शांति प्रदान की। गृतसंबदकी प्रार्थना को स्वीकारते हुए भगवान् गणेश उसी स्थान पर वरदविनायक के स्वरूप में स्थपित हुए। Learn more about your ad choices. Visit megaphone.fm/adchoices

कोल्हापुर जिले के महड़ में स्थित वरदविनायक मंदिर को अष्टविनायकों में चतुर्थ माना जाता है। वरदविनायक, गणेश जी का वर प्रदान करने वाला स्वरूप है जिनका नियमानुसार व्रत करने से सम्पूर्ण मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है। प्रति माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मध्यान्ह के समय वरदविनायक चतुर्थी या वैनायकी चतुर्थी का व्रत किया जाता है।

 

 

पौराणिक मायताओं के अनुसार कौंडिन्य राज्य के राजकुमार रुक्मणगड़ एक बार वन में शिकार करते समय विश्राम करने हेतु ऋषि वचकनवी के आश्रम पहुंचे। रुक्मणगड़ के सौन्दर्य को देख ऋषि की पत्नी मुकुंदा को उनसे प्रेम हो गया और वह राजकुमार से शारीरिक संबध बनाने की इच्छा प्रकट करने लगी। परन्तु सदाचारी रुक्मणगड़ने इस बात को अवैध मानते हुए उन्हें मना कर दिया। उसी समय इस बात से दुखी मुकुंदा को देख कर देवराज इन्द्र के मन में उनके प्रति काम भावना जाग्रत हुई और उन्होंने रुक्मणगड़ से वेश में आकर मुकुंदा के साथ संबंध बनाए। कुछ दिनों के उपरांत इन्द्र के औरस से मुकुंदा ने गृतसंबद नामक एक पुत्र को जन्म दिया।

 

बड़े होने के बाद जब गृतसंबद को इस बात का पता चला की वह एक अवैध संतान है, उसका हृदय दुख से फट पड़ा और अपनी माता को कोसते हुए आश्रम से निकल गया। वह दिन रात अपने भाग्य की निंदा करते हुए वन में भटकने लगा। अंत में थक हार कर गृतसंबद ने अपने मन को शांत करने हेतु भगवान् गणेश की स्तुति करनी शुरू कर दी। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् गणेश ने उसे दर्शन दिया और उसके संतापित हृदय को शांति प्रदान की। गृतसंबदकी प्रार्थना को स्वीकारते हुए भगवान् गणेश उसी स्थान पर वरदविनायक के स्वरूप में स्थपित हुए।

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