नवकलेवर

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दुनिया के किसी भी हिन्दू मंदिर में की जाने वाली यह शायद सबसे ज्यादा रहस्यमयी विधि है। हर बारह से उन्नीस साल के अंतराल पर भगवान जगन्नाथ तथा बलभद्र एवं देवी सुभद्रा की लकड़ी से बनी मूर्तियों का अंतिम संस्कार किया जाता है। इसके पश्चात नयी बनी मूर्तियों में देवों की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। इस प्रकरण में भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा के भीतर सैकड़ों वर्षों से रहती आ रही श्रीकृष्ण के देहावशेष अथवा ब्रह्म-पदार्थ को पुरानी से नयी प्रतिमा के भीतर स्थापित किया जाता है। इस प्रक्रिया को ब्रह्म-परिवर्तन कहा जाता है जिसे कि अंधकार में बेहद ही गोपनीय तरीके से किया जाता है.वहीं भगवान की मूर्तियां भी किसी आम लकड़ी से नहीं बनायी जा सकती। इसके लिये भगवान के सेवक दैतापति, माँ मंगला की शरण में जाते हैं, जो कि उन्हें भगवान के प्रकट होने का स्थान स्वप्न में बताती हैं। इसके बाद देवी के निर्देशित स्थानों पर वो पेड़ मिलते हैं जिसपर भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा वाले पेड़ पर, शंख, चक्र, गदा एवं पद्म और भगवान बलभद्र की प्रतिमा वाले पेड़ पर हल, मूसल और शेषनाग की आकृति आदि चिन्ह बने हुए होते हैं. Learn more about your ad choices. Visit megaphone.fm/adchoices

दुनिया के किसी भी हिन्दू मंदिर में की जाने वाली यह शायद सबसे ज्यादा रहस्यमयी विधि है। हर बारह से उन्नीस साल के अंतराल पर भगवान जगन्नाथ तथा बलभद्र एवं देवी सुभद्रा की लकड़ी से बनी मूर्तियों का अंतिम संस्कार किया जाता है। इसके पश्चात नयी बनी मूर्तियों में देवों की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। इस प्रकरण में भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा के भीतर सैकड़ों वर्षों से रहती आ रही श्रीकृष्ण के देहावशेष अथवा ब्रह्म-पदार्थ को पुरानी से नयी प्रतिमा के भीतर स्थापित किया जाता है। इस प्रक्रिया को ब्रह्म-परिवर्तन कहा जाता है जिसे कि अंधकार में बेहद ही गोपनीय तरीके से किया जाता है.

वहीं भगवान की मूर्तियां भी किसी आम लकड़ी से नहीं बनायी जा सकती। इसके लिये भगवान के सेवक दैतापति, माँ मंगला की शरण में जाते हैं, जो कि उन्हें भगवान के प्रकट होने का स्थान स्वप्न में बताती हैं। इसके बाद देवी के निर्देशित स्थानों पर वो पेड़ मिलते हैं जिसपर भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा वाले पेड़ पर, शंख, चक्र, गदा एवं पद्म और भगवान बलभद्र की प्रतिमा वाले पेड़ पर हल, मूसल और शेषनाग की आकृति आदि चिन्ह बने हुए होते हैं.

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