मुचुकुन्द इक्ष्वाकु वंशी राजा मांधाता के पुत्र थे।
एक बार देवासुर संग्राम में असुरों द्वारा पराजित होने के बाद देवराज इन्द्र मुचुकुन्द के पास सहायता माँगने के लिए आए। देवराज इन्द्र के अनुरोध पर मुचुकुन्द ने देवताओं का सेनापति बनकर देवासुर संग्राम में उनका नेतृत्व किया और एक लंबे युद्ध के बाद देवताओं को असुरों पर विजय दिलाई।
युद्ध के उपरांत जब मुचुकुन्द ने अपने परिजनों के पास पृथ्वीलोक वापस जाने की बात कही तो इन्द्र ने उन्हे बताया की देवलोक में उनके द्वारा व्यतीत एक वर्ष पृथ्वीलोक के हजारों वर्षों के समान है और अब मुचुकुन्द का कोई भी परिजन पृथ्वीलोक में नहीं है।
मुचुकुन्द इतने लंबे युद्ध के बाद थक चुके थे और उन्होंने देवराज इन्द्र से व्यवधान रहित निद्रा का वरदान माँगा।
इन्द्र ने मुचुकुन्द को वर दिया की जो भी उनकी निद्रा भंग करेगा वह भस्म हो जाएगा।
देवराज से ऐसा वरदान प्राप्त कर मुचुकुन्द पृथ्वीलोक में एक गुफा के अंदर गहरी निद्रा में लीन हो गए।
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