काकभुशुंडि

काकभुशुंडि

भुशुंडि का जन्म अयोध्या में हुआ था और वो भगवान श्रीराम के परम भक्त थे। उनकी भक्ति की पराकाष्ठा ऐसी थी की उनको राम नाम के सिवा कुछ और सीखने में मन नहीं लगता था। वो अध्ययन के लिए लोमश ऋषि के आश्रम में गए। वो अपने गुरु को बात-बात में टोककर राम नाम की बात करने लग जाते। एक बार लोमश ऋषि को उन पर अत्यंत क्रोध आ गया और उन्होंने भुशुंडि को श्राप दे दिया, “तुम इतने कठोर बुद्धि वाले हो कि मेरे दिए हुए ज्ञान को सुनने को भी तैयार नहीं हो। तुम्हारे कौवे जैसी कठोर बुद्धि है और मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि तुम कौवा ही बन जाओ।“ इस प्रकार भुशुंडि बन गए काकभुशुंडि। जब भगवान को अपने भक्त की इस दशा का पता चला तो उन्होंने लोमश ऋषि से अपने भक्त को सच्ची भक्ति का ज्ञान देने को कहा। उन्होंने काकभुशुंडि को वरदान दिया कि वो चिरकाल तक रामकथा का पाठ करते रहेंगे और हर काल में प्रभु की लीला का साक्षात दर्शन कर सकेंगे। प्रभु के वरदान से काकभुशुंडि किसी भी देश और काल में भ्रमण कर प्रभु की लीला का साक्षात दर्शन कर सकते हैं। जब गरुड़ देव को प्रभु श्रीराम के देवत्व पर संदेह हो गया था तब काकभुशुंडि ने ही उन्हे रामकथा सुनाई थी। Learn more about your ad choices. Visit megaphone.fm/adchoices

भुशुंडि का जन्म अयोध्या में हुआ था और वो भगवान श्रीराम के परम भक्त थे। उनकी भक्ति की पराकाष्ठा ऐसी थी की उनको राम नाम के सिवा कुछ और सीखने में मन नहीं लगता था। 

वो अध्ययन के लिए लोमश ऋषि के आश्रम में गए। वो अपने गुरु को बात-बात में टोककर राम नाम की बात करने लग जाते। एक बार लोमश ऋषि को उन पर अत्यंत क्रोध आ गया और उन्होंने भुशुंडि को श्राप दे दिया, “तुम इतने कठोर बुद्धि वाले हो कि मेरे दिए हुए ज्ञान को सुनने को भी तैयार नहीं हो। तुम्हारे कौवे जैसी कठोर बुद्धि है और मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि तुम कौवा ही बन जाओ।“

इस प्रकार भुशुंडि बन गए काकभुशुंडि। 

जब भगवान को अपने भक्त की इस दशा का पता चला तो उन्होंने लोमश ऋषि से अपने भक्त को सच्ची भक्ति का ज्ञान देने को कहा। उन्होंने काकभुशुंडि को वरदान दिया कि वो चिरकाल तक रामकथा का पाठ करते रहेंगे और हर काल में प्रभु की लीला का साक्षात दर्शन कर सकेंगे। 

प्रभु के वरदान से काकभुशुंडि किसी भी देश और काल में भ्रमण कर प्रभु की लीला का साक्षात दर्शन कर सकते हैं। 

जब गरुड़ देव को प्रभु श्रीराम के देवत्व पर संदेह हो गया था तब काकभुशुंडि ने ही उन्हे रामकथा सुनाई थी।

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