इल्वल और वातापी दो दैत्य भाई थे जो मृतसंजीवनी विद्या जानते थे। वो अपनी इस विद्या का प्रयोग धनवान राहगीरों को मारकर उनकी संपत्ति लूटने के लिए करते थे।
वातापी एक बकरे का रूप धारण कर लेता जिसे इल्वल अपने अतिथियों को खिला देता। जब सब भोजन कर लेते तो इल्वल, वातापी को आवाज लगता और वो लोगों का पेट फाड़कर बाहर आ जाता।
ऋषि अगस्त्य अपने संपत्ति एकत्र करने के उद्देश्य से दोनों भाइयों के पास गए। उन दोनों ने ऋषि अगस्त्य के साथ भी वही युक्ति लगाई और वातापी को उन्हे खिला दिया।
ऋषि अगस्त्य ने अपने योगबल से उनकी युक्ति जान ली और भोजन समाप्त करते ही अपने पेट पर हाथ फेरते हुए कहा, “वातापी जीर्णम”। उनके ऐसा कहते थी वातापी उनके पेट में पच गया।
जब इल्वल ने अपने भाई को आवाज लगाई तो ऋषि अगस्त्य में मुँह से केवल डकार आई। इल्वल ने क्रोध में आकर ऋषि की मारना चाहा पर उन्होंने अपने योगबल से उसे भस्म कर दिया।
इल्वल और वातापी की संपत्ति से ऋषि ने अपनी पत्नी को राजकुमारी के योग्य सुख-सुविधाएं प्रदान की।
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