एक बार आठों वसु अपने परिवार के साथ जंगल में भ्रमण कर रहे थे उनमें से एक प्रभास की पत्नी की दृष्टि गुरु वशिष्ठ की गाय नंदिनी पर पड़ी। उसने अपने पति से उस दैवी गाय को पाने की इच्छा प्रकट की। प्रभास ने अपने अन्य भाइयों के साथ मिलकर वह गाय चुरा ली।
जब ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को यह बात पता चली तो उन्होंने आठों वसु को मनुष्य योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया। उनके पश्चाताप करने पर ब्रह्मर्षि ने कहा,"मेरे दिए हुए शाप के अनुसार तुम सभी मनुष्य योनि में जन्म तो लोगे और जन्म लेते ही उस योनि को त्यागकर पुनः देवत्व को प्राप्त करोगे। परन्तु इस प्रभास को शीघ्र मुक्ति नहीं मिलेगी और उसे अनेक वर्षों तक मनुष्य योनि में रहना पड़ेगा।"
उसके बाद सभी वसु देवी गंगा की शरण में गए और उनसे प्रार्थना की कि उनका मनुष्य योनि में जन्म उनके पुत्रों के रूप में हो और वही उनको मुक्ति प्रदान करें।
देवी गंगा ने एक सुन्दर स्त्री के रूप में प्रकट होकर महाराज शांतनु से विवाह किया और एक-एक करके सात वसुओं को जन्म देकर तुरंत ही मनुष्य योनि से मुक्ति प्रदान की परन्तु आठवें वसु के जन्म के समय शांतनु ने गंगा को रोक दिया। वह आठवाँ पुत्र वसु प्रभास का अवतार देवव्रत था जो कि संसार में भीष्म के नाम से प्रसिद्द हुआ।
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