अष्टविनायक में पांचवें गणेश हैं चिंतामणि गणपति। यहाँ गणेश जी ‘चिंतामणी’ के नाम से प्रसिद्ध हैं, जिसका अर्थ है कि “यह गणेश सारी चिंताओं को हर लेते हैं और मन को शांति प्रदान करते हैं”.
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार राजा अभिजीत और रानी गुणवती का गणासुर नामक एक पुत्र हुआ। वह गरीबों को परेशान करता और साधुओं की तपस्या में विघ्न डालता था। गणासुर एक बार अपने मित्रों के साथ शिकार पर गया। उस जंगल में कपिल ऋषि का आश्रम था। ऋषि ने गण का स्वागत किया तथा उसे और उसके मित्रों को भोजन पर आमंत्रित किया। भगवान इंद्र ने ऋषि कपिल को चिंतामणि दी थी, जिससे जो इच्छा मांगो, वह पूरी होती थी। उसी मणि का उपयोग करके कपिल ऋषि ने गणासुर के लिए सभी तरह के खाद्य पदार्थों का सृजन किया। इस प्रकार की अद्भुत मणि को देखकर गणासुर के मन में उसे प्राप्त करने हेतु लालसा जाग उठी। अत: गणासुर ने ऋषि के हाथ से बलपूर्वक वह रत्न हथिया लिया।
उसके बाद कपिल ऋषि ने भगवान गणपति की आराधना की। गणपति, ऋषि की भक्ति से प्रसन्न हुए तथा उन्होंने गणासुर का वध करके उससे चिंतामणि वापस ले लिया। जब भगवान् गणेश ने कपिल ऋषि को चिंतामणि वापस करना चाहा, तो उनके प्रति आभार व्यक्त करते हुए कपिल मुनि ने सदैव के लिए चिंतामणि गणेशजी को भेंट कर दी। आज भी वह मणि गणेशजी के गले में एक हार के साथ शोभा पाती है। कथाओं के अनुसार भगवान् गणेश ने गणासुर का वध, एक कदंब के वृक्ष के नीचे किया था, इसीलिए उस स्थान को कदंब तीर्थ भी कहा जाता है।
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