भगवान परशुराम के शिष्य – द्रोणाचार्य
कई पीढ़ियों तक क्षत्रियों का संहार करने के बाद जब भगवान परशुराम ने अपने दादा रिचीक मुनि के कहने पर महेंद्र पर्वत पर जाकर तप करने का निश्चय किया तो उन्होंने अपने द्वारा जीती हुई समस्त संपत्ति को दान करने का निश्चय किया।
जब द्रोण ऋषि को यह बात पता चली तो वो भी भगवान परशुराम के पास दान ग्रहण करने के लिए गए।
भगवान परशुराम तब तक अपना सब कुछ दान कर चुके थे, उनके पास केवल उनका ज्ञान ही शेष था।
भगवान परशुराम ने द्रोण ऋषि को सभी दैवी अस्त्र-शस्त्रों और युद्धकला का ज्ञान दान में दिया और उस ज्ञान को प्राप्त कर द्रोण एक महान योद्धा बने और उन्होंने युद्धकला सिखाने के लिए अपने गुरुकुल का निर्माण किया।
इसी गुरुकुल में सभी कौरव और पांडव भाइयों ने युद्धकला की शिक्षा प्राप्त की।
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