जब श्रीकृष्ण और अर्जुन इन्द्रप्रस्ठ का महल बनाने के लिए उचित स्थान ढूंढ रहे थे, तब अग्निदेव उनके पास आये। राजा स्वेतकी के बारह साल लम्बे महायज्ञ में लगातार घी खाने से उनको बदहजमी हो गयी थी। इस बदहजमी को ठीक करने के लिए ब्रह्मदेव ने अग्निदेव को खाण्डववन और उसमें रहने वाले सभी जीवों को खाने के लिए कहा।
खाण्डववन में इन्द्र का मित्र तक्षक भी रहता था और इसीलिए जब भी अग्निदेव खाण्डववन जलने का प्रयास करते, इंद्रदेव वर्षा करा देते।
अग्निदेव ने श्रीकृष्ण और अर्जुन से उनकी सहायता करने को कहा। दोनों ने अग्निदेव की बात मान ली लेकिन उनसे उचित हथियारों की मांग की।
अग्निदेव ने अर्जुन को चार सफ़ेद दैवी घोड़ों से खींचा जाने वाला हनुमानजी की ध्वजा वाला स्वर्णिम दैवी रथ दिया। इसके साथ उन्होंने वरुण देव से दैवी धनुष गांडीव और दो अक्षय तरकश दिए।
महाप्रयाण से पहले अर्जुन ने गांडीव जल में प्रवाहित कर वरुण देव को वापस कर दिया।
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